मैट्रिक परीक्षा के टॉपर
इस कल्पना को क्या नाम दूं।
मैट्रिक का टॉपर, इंटर का टॉपर, ग्रेजुएशन का टॉपर और तो और मास्टर डिग्री का भी टॉपर। कितना अच्छा लगता है फलनवा का बेटा या बेटी टॉप कर गई। घर के सदस्यों का तो सीना एकाध महीना तक तना रहता है।
लेकिन, हमारे प्रदेश में कहानी कुछ अलग है। टॉप होने में विद्यार्थी का योगदान तो होता ही है परन्तु एक और जीव हैं जिन्हें जीजा कहा जाता है उनके भी योगदान को नकारा नहीं जा सकता।
तो आइए प्रारंभ करते हैं -
जीजा जी एकमात्र ऐसे जंतु माफ कीजिएगा जीव हैं जिनकी अगर साली हो, और अगर उस साली की परीक्षा हो, खास कर बिहार में मैट्रिक का, तो समझिए परीक्षा स्थल पर ये अवतार जरूर लेंगे ही लेंगे।
एक जीजा जिनके जीवन में यदि यह पावन अवसर न आए तो लानत है जीजा कहलाने का। जीजा भले पांचवीं फेल हो, टायर कंपनी में मजदूरी करते हों लेकिन एक साली को परीक्षा में चोरी करवाना जीवन के मूल उद्देश्य में एक होता है।
जैसे ही जीजा जी को पता चला 14 फरवरी से रूपा का परीक्षा शुरू है और खाऊ मल डिग्री कॉलेज में सेंटर है तो एक सप्ताह पहले ही जालंधर से रेल में आरक्षण करवा कर कैलेंडर में तारीख़ को काटना प्रारंभ कर दिया, क्या करे बेचारे ये मौका खुशनसीब जीजा को ही प्रदान होता है।
इधर रूपा, बेचारी को गोबर पाथे से फुरसत था जो पढ़ाई करती। जब समय मिलता भी तो माई के ढील निकालने में व्यस्त हो जाती।
रूपवा के भी जीवन का एके मकसद था, किसी तरह मैट्रिक कर ले फिर बियाह। और जीवन में रखा भी क्या है।
रूपा जब से सुनी की परीक्षा दिलवाने जीजा आ रहे है तो खुशी से झूम उठी। खुशी लाजमी भी था, कॉलेज दो मंजिला था अगर दूसरी मंजिल पर बैठा कर परीक्षा लिया जाता तो इतना ऊपर सिर्फ और सिर्फ जीजा ही लटक सकते थे। अाऊर पुलिस से पचास डंडा से भी जीजा को कुछ होना था। समय के कालचक्र ने नियत समय पर जीजा जी को अवतरित कराया। देख कर रूपा खुशी से शर्मा गई। ये शर्म जीजा को देख कर नहीं वरन् एक विश्वास था कि अब जीजा आ गए हैं हम पास हो जाएंगे और हमारी शादी हो जायेगी।
परीक्षा का पहला दिन जीजा अपना बियहुआ कोट निकाले और विको के क्रीम का लेप अपने दरदरा चेहरा पर घस लिए, चेहरा देख कर लग रहा था जामुन पर नमक छिड़का हुआ है।
उधर बेचारी रूपा शर्मा जी को फाड़ने में लगी थी, शर्मा जी के कुछ उत्तर को फ़ाड़ के जगह जगह लूका रही थी।
जीजा जी सेंटर पर चहुपे। रूपा अंदर गई। इधर जीजा जी सेटिंग में लग गए। पान गुमटी में पहले तो एक तुलसी चौसठ तीन सौ के साथ काला और लवंग का गिलौरी लिया। फिर मुंह में थूक भरकर गुमटी वाले से बोले " का जी लिक हुआ है का रेट चल रहा है। उत्तर एकदम टॉप वाला चाहिए।
पान दुकान वाला पांच सौ लेकर एक पुर्जा थमा दिया। अब जीजा जी के मैराथन शुरू, उ दौड़ लगा के अक्षय कुमार स्टाइल में बाउंड्री तड़पे की पीछे से चर की आवाज आई। पीछे से पैंट दो टुकड़ा में। लेकिन जोश में कुछ कमी नहीं।
लफाड के खिड़किया को पकड़े और सर्कस वाले की तरह एक दम रूपा के पास चीट।
पांच दिन वही कहानी लेकिन अंतिम दिन - एसडीओ साहेब के निरीक्षण था, जीजा जी लटकल थे चीट देने के लिए आऊ पिछ्वाड़ा पर युअह दुलाठी पड़ा कि जीजा जी गिर पड़े और एसडीओ साहेब गीन के पचत्तर लाठी मरवाए।
खैर परीक्षा ख़तम लेकिन बेचारे जीजा बैठ पा रहे थे जे।
रिजल्ट का दिन पेपर खुला और रूपा टॉप।
रूपा खुशी से झूम उठी लेकिन बाहर पत्रकार लोग को देख कर चौंक पड़ी।
और आगे की कहानी तो आपको पता ही है। अगर नहीं पता तो पांच साल पीछे जाइए और खोजिए।
— आपको यह ब्लॉग पोस्ट भी प्रेरक लग सकता है।
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