| ब्लॉग प्रेषक: | अभिषेक कुमार |
| पद/पेशा: | साहित्यकार, सामुदाय सेवी व प्रकृति प्रेमी, ब्लॉक मिशन प्रबंधक UP Gov. |
| प्रेषण दिनांक: | 08-05-2022 |
| उम्र: | 32 |
| पता: | आजमगढ़, उत्तर प्रदेश |
| मोबाइल नंबर: | 9472351693 |
उल्लू के बच्चे से आत्मीय प्रेरणा
उल्लू के बच्चे से आत्मीय प्रेरणा
मानवो को प्रेरणा देता पक्षियों में आपसी एकता, सहयोग की भावना की यह सच्ची घटना
घर में वैवाहिक कार्य सम्पन्न हो जाने के पश्चात अपनी मातृ भूमि जयहिंद तेंदुआ ग्राम में बैसाख की मधुर शाम की बेला में निश्चिन्त होकर टहल रहा था। मेरे घर के ही समीप जहाँ से मैं प्राथमिक शिक्षा की सुरुआत किया था उस मध्य विद्यालय के प्रांगण में तथा इर्द-गिर्द आठ दस पीपल के झमटार पेड़ बहुत पहले से विद्धमान है। इन पेड़ों पर कई प्रकार के एक रुपिय, समरूपिय तथा मिलते जुलते कई प्रजाति के पक्षियों का नित्य बसेरा है जो सुबह-शाम इनकी मनोरम चहचहाट किसी के कठोर दिल को भी पिघला दें, इसमें से कुछ पेड़ तो दादा के जमाने के भी पूर्व के हैं जिसके डालियों के खोन्धर में उल्लुओं के परिवार का स्थाई ठिकाना है। वैसे आम तौर पर पक्षियाँ ब्रह्मुहूर्त में सुबह उठकर भोजन की तलाश में निकल जाते हैं तथा दोपहर या शाम को भोजन की प्रतिपूर्ति कर एवं भोजन के कुछ टुकड़े अपने नन्हे बच्चे के लिए चोंच में दबा कर के वापस अपने घोंसले में लौटते हैं। इस दरमियान उनके बच्चे वयस्क नहीं हुए हैं तो वे घोंसले में अपने माँ को वापस लौटने तक भयाक्रांत रहते है इसलिए कि किसी बड़े शिकारी पक्षी एवं प्राण हंतक जीव-जंतु का हमला न हो जाये।
शाम को जब मैं टहल रहा था तो यहीं पीपल के पेड़ के खोन्धर में एक नटखट प्यारा सा उल्लू का नवजात बच्चा अपने माँ को वापस लौटने का इंतज़ार कर रहा था, मुझे उसके साथ खेलने एवं शरारत करने को सुझा... मैं उस उल्लू के बच्चा की ओर ऊपर मुख कर सिटी बजाया... वह बच्चा डर के सहम सा गया, मैंने फिर सिटी बजाई तो वह अपने आशियाने से निकल कर उसी पेड़ के एक टहनी पर उड़ कर बैठ गया। मैंने फिर उसके ओर मुख कर के सिटी बजाया तो वह और भयभीत हो गया और उड़ कर दूसरे डालियों में जहां अन्य प्रजाति के पक्षी अपने मस्ती में झूम कर गीत गा रहे थें वहां जा कर बैठ गया। मैंने फिर सिटी बजाया तो वह उल्लू का बच्चा एकदम भयभीत हो गया, उल्लू के बच्चे को यह वर्ताव देख कर अन्य पक्षी सकते में आ गए और उल्लू के बच्चे को चारों तरफ से एक सुरक्षा कवच में घेर लिए जैसे मानो वे उसकी रक्षा के लिए जिम्मेदार और चौकन्य है। मैंने फिर भी नहीं माना एक और सिटी अपने मुहँ से फूंका डाला तो वे पक्षियाँ जोर-जोर से शोर करने लगे जिसको सुनकर आस-पास के पेड़ों से कई बिभिन्न प्रकार के प्रजातियों के पक्षियाँ एकत्रित हो गए तथा वे अत्यंत जोर से शोर करने लगे पर वे सभी पक्षी आपसी एकता सौहार्द सहयोग के परिचय देने के साथ भीतर से डरे सहमे भी थें कि न जाने इन चतुर मानवो का इस बार क्या चाल है..! इनमे से कई पक्षी अपने संगी साथियों को बिछड़ने के दर्द को सहन किया है।
भारत के ग्रामीण एवं एकांत इलाके जहाँ पक्षियों का बसेरा है वहाँ बहेलिया बेखौफ घूमते है और जाल लगा कर इन पक्षियों को पकड़ लेतें है तथा इनका व्यावसायिक इस्तेमाल कर धनार्जन करते हैं। हमने कई बहेलिए को उनके क्रियाकलापों को पाप पुण्य की तुला पर तौल कर मानसिक मनोवृत्ति में बदलाव लाने की कोशिश किया तथा पर्यावरण नुकसान की बातों को समझाकर किसी और रोजगारपरक कार्यो के सुझाव दियें। वहीं इनके आश्रय स्थल के हरे और जीवित पेड़ों को इंसान मामूली रकम प्राप्ति के लालच में लकड़ी व्यवसायियों के हाँथो बेच देते हैं जिसके उपरांत वह पेड़ अतिशीघ्र काट दिया जाता है जिससे इन पक्षियों का आशियाना उजड़ जाता है तथा पर्यावरण अहमियत मूल्यों को भी गहरा नुकसान पहुंचता है पर इन सब से बेखबर इस भाग-दौड़ भरी जीवन मे जहाँ पैसा ही सब कुछ है वहां पशु पक्षी, जीव जंतु कल्याण एवं पर्यावरण संरक्षण बातो की क्या महत्वता..?
मैंने सुना एवं पढ़ा है कि इस धरती के सबसे बुद्धिमान जीव मानव ही है पर क्या इन पक्षियों के झुंड मानवो से कम बुद्धिमान है क्या...? एक ओर इंसान गोरे काले, धर्म सम्प्रदाय, जाती पाती एवं ऊँच नीच के भेद भाव में भरमाया एवं उलझा है जहाँ मानवता की मानवीय मूल्यों की बात नहीं सिर्फ अपने समुदायों की एकतरफा बात थोपने की विशेष कोशिश की जा रही है जिससे आपसी कलह उतपन्न हो रहा है और इस कलह के आग में इंसान की इंसानियत जल के भष्म हो रहा है। इन पक्षियों को एकता, सहयोग भला देखिये की उल्लू के बच्चा अकेला उल्लुओं के समुदाय में नहीं बल्कि वो अन्य प्रकार के पक्षियों के समुदाय में जाकर मदत की गुहार कर रहा है और वे पक्षी भी इतना बुद्धिजीवी है कि बच्चा आखिर उल्लू का है या किसी पक्षी का यह फर्क नहीं पड़ता, आखिर है तो किसी पक्षी का ही बच्चा इसको बचाना हम सब का कर्तव्य एवं धर्म है और वे खुद के बचने के साथ-साथ उल्लू के बच्चे के प्रति भी वफादार हैं।
पक्षियाँ खुद के प्रति एवं अपने आश्रय स्थल के पेड़ों के सुरक्षा के प्रति संवेदनशील है एवं मानवो के एक नवीन सिख प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं। वहीं मानवो इनकी संवेदनाओं से बेखबर उल्टे इनके व्यवसायीकरण पर बल दे रहा है।
● आखिर इन पक्षियों ने क्या बिगाड़ा है मानवो का, की इनका रोज शिकार हो रहा है..?
● आखिर क्या कसूर है सीधे-साधे पेड़ो का की चंद रुपये के लालच में इनका जीवित अवस्था में ही काम तमाम कर दिया जा रहा है..?
● पक्षी फसल नुकसान संबंधी कीटो को चट करके हमें जहरीले कीटनाशक रसायनों के दुष्प्रभाव से बचाने के प्राकृत व्यस्था में सहयोग कर रहे है, वहीं पेड़ प्राण वायु ऑक्सीजन का निर्माण कर रहे है, ऐसे दो बहुमूल्य प्रकृत के रचनाओं को आघात पहुंचाकर क्या अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की बात नहीं है..?
● आखिर क्यों नहीं इन लाचार वेबस पक्षियों एवं पेडों की वेदनाएं किसी अखबार के सुर्खियों में प्रकाशित होती...?
● क्या पेड़ और पक्षी के बिना मानव सभ्यता निपट अकेले पुष्पित और पल्लवित हो सकता है..?
आदि ऐसे तमाम सवालात है जिसपर मानवो को गहरी चिंतन की आवश्यकता है एवं लोक मंगल हित के दृष्टिगत पर्यावरण संरक्षण एवं पशु पक्षी कल्याण अहमियत मूल्यों पर जन जागरूकता अति आवश्यक है क्यों कि प्रकृत संसाधनों का अनैतिक दोहन एवं उसके अनबोलते संतानो की निर्मम हत्या एवं चीख पुकार से प्रकृति क्षुब्ध, अशांत एवं नाराज है। यदि ऐसे ही बिना सोंचे समझे प्रकृति के साथ खिलवाड़ अनवरत चलता रहा तो प्रकृत की मार से कोई बच नहीं पायेगा वह डंडे से न मार कर आपदाओं के सैलाब से सब को तरबदर कर देगी क्यों कि प्रकृति किसी भी परिस्थिति में अपने मूल भूत सिद्धांतो को क्षय नहीं होने देती वह सृजन भी करती एवं संघार (प्रलय) भी करती है। यह समझना परमावश्यक है प्रकृत की सत्ता ही मजबूत सत्ता है बाकी सब तो क्षणभंगुर है जो समय काल परिस्थितियों के अनुसार जन्म लेते हैं और एक निश्चित अवधि के उपरांत पुराना होकर नष्ट हो जाते हैं।
जब मैं इस दृश्य देखने के उपरांत मुस्कुराते हुए आगे की ओर बढ़ चला तो उन तमाम पक्षियों में जान में जान आई और मुझे आगे की ओर जाता देख वह उल्लू का बच्चा अन्य पक्षियों को शुक्रियादा कर झट से अपने आशियाने की ओर उड़ चला फिर पक्षियाँ भी शोर नहीं चहचहाने लगें मानो कोई नया मधुर राग छेड़ा हो और इस पर कोयल की कू.. कू.. बांसुरी बजा रहा हो, बगुले ही हिनहिनाहट मानो तबले की गध की आवाज निकाल रही हो एवं बीच-बीच मैनियों का आवाज मानो तबले की टन सी आवाज आ रही हो तथा इस बीच सुगा की आवाज वातवरण में सहनाई की धुन छेड़ रहे हैं। कौवे का समुदाय कोई सुर ताल से नहीं ऐसे ही किसी धुन में हारमोनियम की बिखरी आवाज के भांति काँव-काँव कर रहा है पर शालीनता से।
जब मैं टहल कर वापस लौटा तो पुनः मुड़ कर तिरछी नजरो से खोन्धर में बैठे उस उल्लू के बच्चे को देखा तो वह मंद-मंद मुस्कुरा रहा था और उसकी मुस्कुराहट ने मुझे आत्मीय प्रेरणा प्रदान कर रह था।
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