| ब्लॉग प्रेषक: | Divyanjli verma |
| पद/पेशा: | लेखिका |
| प्रेषण दिनांक: | 07-04-2023 |
| उम्र: | 27 |
| पता: | फैजाबाद,अयोध्या, उत्तर प्रदेश |
| मोबाइल नंबर: | 8417935207 |
एक औरत की व्यथा
एक छोटे से गांव मे एक आरती नाम की लड़की रहती थी। उसका पिता किसान था। और किसानी करके ही अपने परिवार का भरण पोषण करता था। परिवार मे आरती और उसके माँ बाप के अलावा उसकी तीन छोटी बहने भी थी।
कहते है कि शहर मे रहने वाली महिलाओ की जिंदगी बहुत भाग दौड़ भरी होती है। लेकिन गांव की महिलाओ की जिंदगी भी भाग दौड़ से कम नहीं होती। फर्क़ बस इतना होता है कि शहर की महिला पैसा कमाने के लिए भाग दौड़ करती है। सारा दिन काम करती है। फिर उस पैसे से अपनी सुख सुविधा की सारी चीजे खरीदती है। जबकि गांव की महिला सीधे ही उस सुख सुविधा का इंतजाम करती है। जैसे गेहू पीसना, मसाला खूटना, दूर कुए से पानी लाना, खेत से फसल काट के लाना।
आरती की जिंदगी भी कुछ एसी ही थी। एक सुबह 4 बजे वो उठ जाती थी। शायद तब उजाला भी ठीक से नहीं हुआ होता था। नित्य कामों को करने के बाद वो मटकी लेके अपनी माँ के साथ दूर कुए से पानी लेने जाती। उसके साथ ही उसकी छोटी बहन भी 2 मटकी लेके जाती। जिससे ज्यादा पानी ला सके। करीब 2 घण्टे लगते थे कुए तक जाने और फिर वापस आने में। तब तक दिन भी निकल आता था। वापस आने के बाद आरती झाड़ू बहारू में लग जाती और उसकी माँ चूल्हे में आग सुलगाने में। जब तक आरती की माँ रोटियां सेकती ।आरती सुखी जमीन को लीप देती थी।
तब तक उसके बापू भी जंगल से सूखी लकड़ियां ले आते थे। और सब साथ मे बैठ कर रोटियां खाते। उसके बाद आरती अपने बाबा के साथ खेत पर काम करने चली जाती थी और शाम तक वहीं धूप मे कड़ी मेहनत करती रहती थी। जिससे उसे खाने को भोजन नसीब हो सके। एक पल को भी आराम ना करती थी वो। बस लगी रहती थी खेतों के काम मे। फिर शाम को घर लौट के भी आराम ना था क्योंकि दिन ढलने से पहले ही खाना बना लेना होता था । तो आरती खाना बनाने मे लग जाती थी । तब तक उसकी माँ और बहन पानी लाने जाते थे। और जब तक खाना बन के तैयार होता वो लोग भी पानी लेके लौट आती थी। और सब साथ मे खाना खाके फिर सो जाते थे अगले दिन की कड़ी मेहनत के लिए।
सिर्फ आरती का ही नहीं। बल्कि गांव के हर घर मे सब इसी तरह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त रहते थे।
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