| ब्लॉग प्रेषक: | राजीव भारद्वाज |
| पद/पेशा: | व्यंग्यकार |
| प्रेषण दिनांक: | 25-07-2026 |
| उम्र: | 37 |
| पता: | गढ़वा |
| मोबाइल नंबर: | 9006726655 |
आइए न हमरा बिहार में।
आइए न हमरा बिहार में।
अरे सामसुंदर, ई पुलिसीय गाड़ी ले आया रे। आई हो दादा, सब इयार दोस्त के बैठा के धरना वाले जगह से पुलिस गाड़ी ले भागा, इहे ह बिहार, साला ठीके कहता है सब, एक बिहारी सौ पर भारी।
पानी के बौछार वाला गाड़ी के ड्राइवर से विनती करके की एक बार पनिया चलवा दीजिए हुजूर, बड़ी गर्मी हो रहा है। बताइए अब सरकार का व्यवस्था करेगा, जहां सजा भी मजा दे वहां का उपाय है।
सड़क किनारे का वह मैदान आज केवल धूल-धक्कड़ का ढेर नहीं था, उसमें लोकतंत्र की सुराही छलक रही थी। चारों तरफ गोंदली के पत्तों जैसी चंचल भीड़। यह कोई गुस्सा या विरोध का अखाड़ा नहीं था, ई तो गाँव-जवार का महापरब था। दिल्ली-पंजाब वाले जिसे प्रोटेस्ट कहकर माथा फोड़ते हैं, अपने बिहार के धरमदास और लछमन बाबू के लिए वह बस इतवार की शाम का आओ रे ज़रा हहरा के छमका लिया जाए था।
सूरज अभी पच्छिम की कछार पर झुका भी नहीं था कि नेता जी लउडस्पीकर के भोंपू पर चढ़ गए। चोंगे से लबर-लबर का ऐसा सोता फूटा कि पेड़ पर बैठीं चकई भी फुर्र से उड़ गईं। विषय चाहे महँगाई का हो या बेकारी का, नेता जी का ब्योरा तो महाभारत के संजय जैसा था, भाषण में चाणक्य नीति का तड़का, बीच में सास-ससुर की खटपट और अंत में समधिन के गाँव की कथा। पीछे खड़ा मरखंडी चेला हर दो साँस बाद छाती ठोककर भोंपू में घोंप देता इंकलाब... जिंदाबाद। भीड़ का नरेटी भले न कसके, बेचार का नरेटी ज़रूर छिला गया था।
उसी समय दरोग़ा जी आपन मूँछ पर ताव देते पहुँचे। मगर जुलूस वालों का मिज़ाज ही अलग था। चेलाराम दौड़कर दारोगा जी के पाँव पर गिर पड़ा और बोला, हज़ूर टीयर-गैस का व्यवस्था नहीं किए हैं ? अगर है तो ज़रा जल्दी फेंकिएगा। पिछली बेर बिना रोए-धोए जुलूस में सोहाग ही नहीं आया था। अख़बार वाला छक्कू राम बोल रहा था कि बिना आँसू के फोटो में रौनक़ नहीं बनता है। दरोग़ा जी भकुआ गए। टोपी खिसकाकर बोले अरे, तुम लोग धरने पर आए हो या बिआह का मड़वा छाने? खैर,
धुआँ छूटा। दो मिनट तक पूरे मैदान ने खाँस-खाँसकर लोकतंत्र की साँस दुरुस्त की। बबलू तो तीसरका बार उ धुआं लिया, जब एकदम आंख लाल हो गया तो बोला बड़ी चरक माल है, गांजा से ज्यादा काम करता है।फिर आई साहेब की नीली गाड़ी से 'पनसोखा' पानी की बौछार! बस, फिर क्या था! परती का मैदान सीधा कजरी का अखाड़ा बन गया। कोई महुआ पिए नागिन की तरह लोट रहा है, कोई फगुआ गा रहा है, तो कोई दोनों हाथ पसारकर छाती थुरा रहा है। एक भीतरगुनिया नेता कैमरे वाले को देखते ही ऐसे भीगने लगा मानो देश पर बलिहारी हो रहा हो। जैसे ही लेंस ढका, फुसफुसाया, अरे तौलिया लाओ रे नहीं तो सरद-गरम हो जाएगा।
उधर गाँव के दो-चार लफुआ और बकलोल कार्यकर्ताओं का धरम जागा। आँख पड़ी लोहे की बैरीकेटिंग पर।
लोहा का भाव तो आजकल बढ़ल है।
बस, तीन-चारों ने मिलकर लोहे के खंभे को काँधे पर लादा और सीधे दुलारचंद कबाड़ी की दुकान पर धर आए।
कबाड़ी ने अचरज से पूछा कहाँ से उखाड़ लाए रे?
छाती तानकर जवाब मिला जनहित में रसीद कट गई है, समझे?"
बीच में बेचारा लाल रंग का सरकारी फाटक पड़ा था। उस निगोड़े का क्या कसूर? मगर जन-सैलाब ऐसा कि फाटक ने भी आख़िरी चरमराहट में सोचा होगा—अरे राम, काश हम बाँस की किवाड़ी होते, तो कम-से-कम मूँज की रस्सी से तो बाँध दिए जाते।
फिर शुरू हुआ असली दंगल पुलिस और जनता के बीच रस्साकशी। जैसे कारतिक के मेले में कादो-पानी का खेल हो रहा हो।उधर से सिपाही खींचें, इधर से पढ़े वाला लईकन। आऊ तो आऊ दु गो लड़का अंपायर बनके लगा प्वाइंट गिनने, दु एक, चार तीन। बीच में नेता जी औंधे मुँह गिर पड़े, पानी में चारों तरफ़ कादो ही कादो। कोई नरभसा रहा था, कोई अलबलाकर भागे जा रहा है, और गाँव का टेपरिया मोबाइल हाथ में लिए परपरा रहे माथे को पोछ रहा था, सटाके आ रे, लाइव चल रहा है फेसबुक पर।
ढलती साँझ में मंच पर भोथर भाषण फिर शुरू हुआ। सामने खड़ा पहरेदार जम्हाई ले रहा था, पर भीड़ की छाती फ़ूलकर कुप्पा थी। हर झूठ पर ताली, हर लफ़्फ़ाज़ी पर जयकारा।
एक बूढ़े गनौरी काका ने पिछौड़ी सँभालते हुए पूछा
अरे बाबू, ई सब मार-काट किस माँग के लिए हो रहा है?
छोटका चेला हँसकर बोला काका, माँग-पत्तर तो बाद में बनता रहेगा, पहले टीवी पर चेहरा आ जाए।
सूरज डूबते-डूबते सबका नरेटी बैठ चुका था। कुर्ते की धज्जियाँ उड़ चुकी थीं, एक पाँव की चप्पल कादो में समा गई थी। मगर चेहरे पर वह गरब था, जैसे पूरे भारतवर्ष का भार इन्हीं के जर्जर काँधों पर टिका हो।
रात को दीया-बाती के समय प्रेसरन (प्रेस कॉन्फ्रेंस) हुई।
पत्रकार ने माइक सटाकर पूछा, नेता जी, आज के इस विकट आंदोलन से हासिल क्या हुआ?
नेता जी की दाँती खिल गई, गाल पर चमक आ गई
अरे, बैरीकेटिंग बिक गई, फाटक उखड़ गया, सरकारी पानी से नहा लिए, आँसू गैस का परसाद मिल गया, और चेहरा टीवी पर आ गया... अब इससे बड़ा कौन सा पैकेज चाहिए बाबू?
सचमुच, अपनी माटी का धरना कोई उपद्रव नहीं, एक जीती-जागती कथा है। यहाँ मुद्दे बाद में जन्म लेते हैं, किस्से पहले रचे जाते हैं। यहाँ विरोध भी उत्सव है, रस्साकशी भी फाग है, पानी की बौछार वाटर पार्क है, और बैरीकेटिंग... वह तो कबाड़ी की मुक़द्दर की लकीर है।
लोकतंत्र जिंदाबाद... और बिहार का ई रंग-बिरंगा धरना उससे भी ज़्यादा जिंदाबाद। जय बिहार।
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