बाल कहानी-अधूरा सपना
बात उन दिनों की है, जब मैं बहुत छोटा था। मैं तकरीबन बारह साल का था। मैं उस समय कक्षा सात का छात्र था। मुझे अच्छी तरह से याद है। घर के पास ही एक प्राइमरी स्कूल था, जिसमें मेरा छोटा भाई कक्षा पाँच और छोटी बहन कक्षा तीन में पढ़ती थी।उसके कुछ ही दूरी पर उच्च प्राथमिक विद्यालय था, जहाँ मैं कक्षा सात में पढ़ता था। मैं पढ़ने में बहुत अच्छा था। मैं प्रतिदिन समय पर विद्यालय जाता था। मेरी आखों में बहुत से सपनें थे, जिन्हें मुझे पढ़-लिखकर पूरा करना था।
विद्यालय में सभी शिक्षक बहुत मेहनत से पढ़ाते थे। एक दिन शिक्षक कक्षा में सभी से प्रश्न पूछ रहे थे कि-, "बताओ! आप बड़े होकर क्या बनोगे? जब मेरी बारी आयी और मुझ से पूछा गया-, "सोनू! बताओ तुम बड़े होकर क्या बनोगे? क्या सपने हैं तुम्हारे? कुछ सोचा हैं कि नहीं?"
मैनें बहुत उत्साह और विश्वास के साथ उत्तर दिया कि-, "मैं बड़ा होकर डाक्टर बनूँगा।"
गाँव में ही अस्पताल खोलूँगा। सभी की खूब सेवा करुँगा। अपने साथ-साथ परिवार, समाज और देश के लिये इस सपने को साकार करुँगा। खूब मेहनत से पढ़ाई करुँगा, ताकि मेरा सपना समय पर पूरा हो सके।" मेरी बात सुनकर सभी ने ताली बजायी। उसके बाद छुट्टी का समय हो गया मैं विद्यालय से घर आ गया। घर आके देखता हूँ कि माँ और पिताजी सामान पैक कर रहें हैं।
उन्होंने मुझ से भी तैयार होने को कहा। मैं भी तैयार हो गया। कुछ देर बाद हम सब सफ़र करने लगे। इससे पहले मैं कुछ पूछता, मेरे भाई बहनों ने बताया कि हम सब लोग नानी के यहाँ शहर जा रहे हैं। मुझे लगा कि हम सब लोग कुछ दिनों के लिए घूमने जा रहे होगें, फिर वापस आ जायेंगे, पर नहीं मेरी सोच गलत थी।
कुछ दिनों के बाद पिता जी ने शहर में ही एक होटल खोल लिया। उस होटल में वह समोसा बेचने लगे और मैं उनके साथ काम करने लगा। मेरे सारे सपने टूट गये।
कुछ साल के बाद पिता जी बीमार हो गये। सारी जिम्मेदारी मुझ पर आ गयी। मैं पूरी ईमानदारी से पिता जी का अधूरा काम पूरा करने लगा।
इस तरह से मेरी पढ़ाई अधूरी रही। मैनें अपने छोटे भाई बहन का नाम पास के ही स्कूल में लिखवा दिया। घर की जिम्मेदारी, पिता का इलाज़ का खर्च पूरा करने के लिये मेरे दिन रात होटल पर ही बीतते रहे। भाई-बहन की फीस भी मैं समय पर देता रहा। मैं खुद नहीं पढ़ सका, पर भाई-बहन को पढ़ा दिया।
आज मेरी उम्र 30 साल की है।
मेरा आज भी मन करता हैं कि मैं स्कूल जाऊँ, पर सच ये हैं कि मेरा सपना अधूरा रह गया।
शिक्षा
हमें अपने सपने के बारे में घर के बड़ों को समझाने का प्रयास करना चाहिए ताकि बाद में पछतावा न रहे।
शमा परवीन
बहराइच (उत्तर प्रदेश)
#trshamaparveen
— आपको यह ब्लॉग पोस्ट भी प्रेरक लग सकता है।
नए ब्लॉग पोस्ट
धरना नहीं, महामेला!
सड़क किनारे का वह मैदान आज केवल धूल-धक्कड़ का ढेर नहीं था, उसमें लोकतंत्र की सुराही छलक रही थी। चारों तरफ गोंदली के पत्तों जैसी चंचल भीड़। यह कोई गुस्सा या विरोध का अखाड़ा नहीं था, ई तो गाँव-जवार का महापरब था। दिल्ली-पंजाब वाले जिसे
Read More
आस्था है ब्रह्मांड का अस्तित्व है धर्म जन्म के जीवन की दिशा दृष्टिकोण निर्धारण करने का मार्ग है या जन्म जीवन के सत्यार्थ बोध का सत्य है। धर्म ईश्वरीय सत्य का विज्ञान है या आचरण एव संस्कार निर्माण का पथ सिद्धांत है।
सर्व प्रथम यह जानना आवश्यक है कि धर्म..
Read More
कार्तिक की उजली रात थी। आकाश में चांद कटी हुई कचौड़ी की तरह पीला और चिकना दिख रहा था। धान के खेतों से सोंधी, अलसाई महक आ रही थी। ठीक उसी समय पूरब टोली के पोखर के पास बंधे लाउडस्पीकर ने भों-भों करना शुरू किया और पूरे नौडीहा गांव की छाती धड़क उठी।
“आ गया है
Read More
गर्मी की एक चिलचिलाती सुबह थी। मैं रोज़ की तरह मोहल्ले की चाय की दुकान पर खड़ा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। दुकान पर लोगों की भीड़ थी, राजनीति पर बहस चल रही थी और हर कोई अपने-अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने में व्यस्त था। तभी फटे-पुराने कपड़ों में एक विक्षिप्त
Read More
एक सफर - सौ तमाशे
मैं समय हूँ...
रेलवे स्टेशन में लगे घड़ी का समय। आप मेरे समय को देख कर रेल के टाइम से आने का समय न मिलाए और न ही अपनी घड़ी को मिलाएं, मै रेलवे का समय हूं। मैंने राजाओं का उत्थान-पतन देखा है, साम्राज्यों को बनते-बिगड़ते देखा है, किंतु जो
Read More
नियुक्ति पत्र का महाभारत।
हमारे यहां शिक्षक की नियुक्ति अब नौकरी नहीं रही, यह तपस्या बन चुका है। पहले ऋषि-मुनि जंगल में बैठकर भगवान को प्रसन्न करते थे, आज अभ्यर्थी साइबर कैफे, कोचिंग और कोर्ट-कचहरी के बीच बैठकर नियुक्ति पत्र क
के लिए आयोग को प्रसन्न करने
Read More