बहुत हुआ सम्मान।

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ब्लॉग प्रेषक: राजीव भारद्वाज
पद/पेशा: व्यंग्यकार
प्रेषण दिनांक: 09-02-2026
उम्र: 38
पता: गढ़वा झारखंड
मोबाइल नंबर: 9006726655

बहुत हुआ सम्मान।

मैं लक्ष्मी-वंदना में व्यस्त था, हे भ्रष्टाचार प्रेरणी, हे कालाधनवासिनी, हे वैमनस्यउत्पादिनी, हे विश्वबैंकमयी, हे कष्टनिवारिणी मुझपर कृपा कर! बचपन में मुझे चवन्नी मिलती थी पर इच्छा अठन्नी की होती थी, परंतु तेरी चवन्नी भर कृपा कभी न हुई। यहाँ तक मुझमें चोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि की सदेच्छा भी पैदा न हुई वरना होनहार बिरवान के होत चिकने पात को सही सिद्ध करता हुआ मैं अपनी शैशवकालीन अच्छी आदतों के बल पर किसी प्रदेश का मंत्री/किसी थाने का थानेदार/किसी क्षेत्र का आयकर अधिकारी/आदि-आदि बन देश-सेवा का पुण्य कमाता और लक्ष्मी नाम की लूट ही लूटता। युवा में मैं सावन का अंधा ही रहा। जिस लक्ष्मी के पीछे दौड़ा, उसने बहुत जल्द आटे-दाल का भाव मुझे मालूम करवा दिया। हे कृपाकारिणी मुझपर इस प्रौढ़ावस्था में ही कृपा कर। मैं मानता हूँ कि मैंने ईमानदार और कड़क बनकर तेरी आराधना के समस्त द्वार बंद कर दिए हैं परंतु हे रिश्वकेशी तेरे प्रताप से जेलों के ताले खुल जाते हैं, एक ईमानदार और कड़क व्यक्ति के द्वार क्या चीज़ है। एक दरवाज़ा मेरी ही खोल दे।

तुम तो जानती हो कि कोरोना काल में मुझे घर पर बिठा दिया गया था, इस दौरान तेरी चाहत में मैने कुछ क्रिएटिव करने को सोचा और किया, फलस्वरूप मुझे पुत्र प्राप्त हुआ। खर्च बढ़ी एक साल बाद फिर मैने कुछ अलग करने को सोचा, इस बार पुत्री की प्राप्ति हुई। बस धन की प्राप्ति से हर बार वंचित रहा।


तभी दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी। पत्नी बोली, "सुनते हो, देखो शायद लक्ष्मी आई है।" मैं मुद्रस्फीति-सा एकदम उठकर लक्ष्मी के स्वागत को बढ़ा परंतु रुपए की अवमूल्यन-सा लुढ़क गया। क्यों कि मेरी पत्नी ने जिस लक्ष्मी के स्वागत के लिए दरवाज़ा खोलने का अलिखित आदेश दिया था, वह उस समय के अनुसार हमारी कामवाली हो सकती थी जिसके स्वागत की परंपरा हमारे परिवारों में कतई नहीं है।


"दरवाज़ा तुम ही खोल दो।" मेरे स्वर में आम भारतीय की हताशा थी, निराशा थी।

पत्नी ने दरवाज़ा खोला, सामने लक्ष्मी नहीं, लक्ष्मीकांत वर्मा थे। उनका चेहरा सरकारी कर्मचारी को महंगाई-भत्ता मिलने के समाचार-सा खिला हुआ था। लक्ष्मीकांत बोले, "भाभी जी, आज तो फटाफट मिठाई मँगवाइए, बढ़िया चाय पिलवाइए और घर में बेसन हो तो पकौड़े भी बनवा दीजिए।"

उसकी इस मँगवाइए/बनवाइए आदि योजनाओं पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया देते हुए मैंने कहा, "क्यों शर्मा, क्या तू विश्व बैंक का प्रतिनिधि है जो तेरा अभूतपूर्व स्वागत करने को हम बाध्य हों?"

"यही समझ ले घोंचूलाल! देख, मैं भाभी जी से बात कर रहा हूँ, तू बीच में अपनी टाँग क्यों अड़ा रहा है? भाभी जी, मैं आपके लिए हज़ारों रुपए मिलने की ख़बर लाया हूँ और ये है कि," लक्ष्मीकांत ने अमेरिकी स्वर में कहा।

"तुम चुप रहो जी!" पत्नी ने ससम्मान मुझे डाँटा और लक्ष्मीकांत की तरफ़ मुस्कराकर देखा तथा कहा, "आप बैठिए न भाई साहब मैं अभी आपके लिए सबकुछ बनाकर लाती हूँ। आप हज़ारों मिलने वाली बात बताओ न।" पत्नी में ऐसा सेवाभाव मैंने कभी नहीं देखा था।

"भाभी जी, सरकार ने मैयां सम्मान योजना शुरू किया है, आपको हर माह 2500 रुपए मिलेंगे। 


पत्नी विवाहित जीवन के पंद्रह वसंत देखने से पूर्व या तो चहकी थी या फिर उस दिन लक्ष्मीकांत उवाच के कारण चहकी और चहकते हुए उसने पूछा, "सही में 2500 मिलेंगे"

"सौ पर्सेंट।"

 ये पच्चीस सौ हमें कब मिलेंगे लक्ष्मी मैया!"

"भाभी जहाँ इतना इंतज़ार किया वहाँ थोड़ा इंतज़ार और कर लो। आप देख लेना कुछ दिनों में ये पच्चीस सौ नहीं दस हजार तक हो जाएगा। सरकार सबको अपनी कमाई का शेयर देना चाहती है।  लक्ष्मीकांत ने आशीर्वादात्मक मुद्रा में कहा।

"पार्टी तो आप जितनी ले लो। पंद्रह-बीस हज़ार! भाई साहब मुझे लगता है कि आप मेरा मन रखने के लिए ऐसा कह रहे हैं, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है। बेसन नहीं मैं आपके लिए राजलक्ष्मी मिठाई दुकान से पिस्तेवाली बरफी मँगवाती हूँ कोला तो आपको पीकर ही जाना होगा। तुम आराम से सोफ़े पर क्या बैठे हो जल्दी से बाज़ार हो आओ हे भगवान!"


लक्ष्मीकांत तो अपना सत्कार कर के चले गए परंतु हम पति-पत्नी एक अंतहीन बहस में उलझ गए। पहले कमा कर कुछ राशि का भोग मेहरारू को लगा देता था, लेकिन मैयां सम्मान की राशि मिलने के बाद तो मेरा सम्मान का एल लगना तय था।

अब मेरे घर प्रतिदिन अखबार आने लगा और पत्नी रोज़ सुबह मुझे उठाती, हाथ में अख़बार पकड़ाती और जैसे मैं कभी माँ को रामायण सुनाया करता था वैसी ही श्रद्धा से पत्नी को सरकार की योजनाओं के बारे में पढ़कर सुनाया करता। हम घंटों उस पेज को घूरते रहते, जिसमें योजना लिखा रहता है। देश में कहाँ हत्या हो रही है, किसका घर जल रहा है और कौन जला रहा है ऐसे समाचारों में हमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी। जिस दिन मैयाँ सम्मान का खबर आता उस दिन पत्नी अच्छा नाश्ता और भोजन खिलाती और जिस दिन खबर नहीं आता उस दिन घर में जैसे मातम छा जाता। बच्चे पिट जाते और पति-पत्नी के बीच महाभारत का लघु संस्करण खेला जाता। पत्नी का रक्तचाप पहले केवल मेरे कारण बढ़ता-घटता रहता था, आजकल मैयां सम्मान की उसमें महत्वपूर्ण भूमिका रहती।

राशि मिलने पर पत्नी ने संतोषधन नामक मंत्र का जाप शुरू किया है, उस मंत्र में मुझे प्रातः काल जम कर कोसा जाता है और मेरे महान परिवार के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है। पत्नी जी के नजर में सरकार साक्षात् विष्णु बने हुए हैं और पति जो विष्णु का स्वरूप है उसमें कंस और रावण की छवि दिख रही है।

मेरी ड्यूटी निर्धारित की गई है और कार्य का आवंटन किया गया है जो इस प्रकार है :- 

* प्रातः काल हाथ में झाड़ू लेकर घर की साफ सफाई।

* नाश्ता का प्रभार मेरे हिस्से। भोजन का भी मिलता परन्तु कार्यालय का भी कार्य आवंटन के फलस्वरूप दोपहर के भोजन की जिम्मेदारी पत्नी ही निभाती हैं।

* संध्या बर्तन और डिनर मेरे हिस्से।

* दो घंटे अपनी लक्ष्मी स्वरूपा मेहरारू की मालिश भी इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें मैयाँ सम्मान मिलता है।

अब मैं लक्ष्मी वंदना नहीं करता हूँ, बस लक्ष्मी मैया से एक प्रश्न करता हूँ, कहीं तुम भी तो चुनाव नहीं लड़ रही हो!"

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