मैं आजाद हूं।

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ब्लॉग प्रेषक: राजीव भारद्वाज
पद/पेशा: व्यंग्यकार
प्रेषण दिनांक: 15-08-2026
उम्र: 37
पता: गढ़वा
मोबाइल नंबर: 9006726655

मैं आजाद हूं।

मैं आजाद हूँ ।

गाँव के पूरब टोले में पीपल का पुराना ठूंठ आज फिर बहस की वेदी बना हुआ था। सिरकाही धूप में मधेसर चा अपनी पुरानी लाठी पर दोनों हाथ टिकाए, खंखारते हुए बोले, अरे भइया, हम तो कहते हैं कि देस में अजादी का बयार बह रहा है। अब देखो न, हमारे ज़माने में अंग्रेजों की गोरी पल्टन पुलिस थाने में दारू छलका छलका कर नाचते रहती थी, और आज अपने देस के बाबू साहेब नोटों की नांव बनाकर पानी में बहा रहे हैं। अजादी का इससे बड़ा जलवा और क्या होगा ।

तभी पास के चबूतरे पर खैनी मलती हुई झूलन काकी ने घुंघट की ओट से हुंकार भरी। आँख का काजल पसीने से बहकर गाल पर रेखा बना गया था। काकी की छाती से एक अकुलाहट भरी आह निकली, हाँ मधेसर चा, अजादी तो छप्पर फाड़ के आई है, पर हमरी देहरी लाँघना भूल गई। तनिक पूरनवा की ओर भी तो देखो, बेचारगी की मूरती बना बैठा है।

पूरनवा, टोले का सबसे पढ़ा-लिखा लड़का। हाथ में बी.ए. की सनद, चेहरे पर पढ़ाई की कालिख, माथे पर सफ़ेद पट्टी और आँखों में जगमगाती डिग्रियों के बाद का भयावह सन्नाटा। पूरन के सामने उसकी पाँच साल की मेहनत का एडमिटकार्ड रखा था, जो कल ही पटना के कौनो सेंटर से बिना परीक्षा दिए लौट आया था।

का हुआ रे पूरन, मधेसर चा ने चुटकी ली, "तू तो बड़े साहब बनने वाला था ना? दारोगा की नौकरी का परीक्षा दे आया, और ये माथे पर पट्टी काहे बांधे हो।

पूरन की आँखों के कोरों पर पानी की एक बूँद ठहर गई। वह फीकी हँसी हँसा, चा, हम तो पर्चा हल करने पहुँचे थे, पर हमसे पहले तो पर्चा सेठ जी के तिजोरी में बिक चुका था! और जब हक माँगने सड़क पर उतरे, तो 'अजादी' का असली प्रसाद मिला। पुलिस की दनादन लाठियाँ चटकीं, आँखों में मिर्च-सी चरचराती आँसू गैस के गोले छूटे, और ठंडे पानी की बौछार से हड्‍डी-हड्‍डी काँप गई, यह पट्टी उसी सरकारी दुलार की निशानी है।

और सुनो चा,पूरन ने हँसते हुए माथे की पट्टी को छुआ, माथा फूट गया, खून बह निकला, पर हम सब लरिका वहीं सड़क पर बैठकर गिटार बजाकर गाने लगे,'माथा फोड़ा है तो क्या, दिल तो अभी जिंदा है' का करें चा, हँसते नहीं तो रोते-रोते दम घुट जाता। हमारे टोले के तीन-तीन लरिकों ने पंखे से लटककर अपनी अजादी चुन ली, कौनो भूख हड़ताल पर बेसुध पड़ा अस्पताल में पेट में पानी भर रहा है। जब मौत और मुफ़लिसी का नंगा नाच सामने हो, तो फूटे माथे से हँस लेना ही मनोरंजन बन जाता है।

पर चा, पूरन की आवाज़ में अचानक एक अजीब-सी चमक और ज़िद्द आ गई, माथा भले फोड़ दिया हो, लाठी भले तोड़ दी हो, पर कलेजे में एक आस अभी भी बची है। हमें भरोसा है, आज नहीं तो कल, इस अंधी-बहरी सरकार के कान के परदे फटेंगे और न्याय ज़रूर मिलेगा, यह उम्मीद ही तो हमें ज़िंदा रखे है।

धत्त तेरे की, झूलन काकी ने कसमसाकर कहा, अरे, पैसे देकर जो अक्ल से पैदल महाराणा प्रताप बने घूमते हैं, वही इन लरिकों पर लाठी चलवाते हैं, अक्ल के नाम पर गोबर भरा है, पर रौब ऐसा कि साक्षात हल्दीघाटी जीतकर आए हों। दस्तखत करना आता नहीं और चले हैं पढ़े-लिखों का नसीब तय करने।

मधेसर चा ने अपनी धोती का खूँट सँभाला और ठहाका मारते हुए बोले, काकी,  तुम राजनीति का गूढ़ मरम क्या समझोगी, अरे, जमाना बदल गया है। लरिका भूख हड़ताल करे, लाठी खाए, पंखे से लटके या माथा फुड़वाकर गाना गाए, इसी का नाम तो अजादी है।लरिका दिन-रात लालटेन जलाकर आँख फोड़े, और बापू खेत बेचकर दलाल का पेट भरे। अरे, अजादी तो उस दलाल और फर्जी साहेब की हुई है, जो पैसों के दम पर अरमानों का सौदा कर रहे हैं।

अरे, जब सब कुछ बिक ही रहा है, तो कोई हमारी इस बी.ए. की डिग्री का भाव भी लगा दे, दो किलो अरहर की दाल ही मिल जाती। पूरन की आवाज में एक हताश व्यंग्य था, जिसके पीछे का दर्द कलेजे को छील रहा था।

झूलन काकी ने अपने फटे आँचल से पूरन का माथा पोंछा। उसकी आँखें भर आई थीं। बोली, हाँ बेटा, तू ठीक कहता है। हम आज़ाद हैं। सरकार आज़ाद है पर्चा लीक करने वालों को बचाने के लिए, दलाल आज़ाद हैं नौजवानों का खून चूसने के लिए, पुलिस आज़ाद है माथा फोड़ने के लिए, और तू आज़ाद है, फूटे माथे पर पट्टी बाँधकर, न्याय की आस में हँसते-हँसते इंकलाब का नारा लगाने के लिए। बोल, भारत माता की जय।

पूरन चुपचाप पीपल के पत्तों की सरसराहट सुनता रहा। हवा में एक अजीब-सी गंध थी, अधिकारों के सड़ने की गंध, और उसके बीच खिलखिलाती एक जिद्दी आस की गंध। मधेसर चा ने अपनी लाठी उठाई और बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गए, 

हाँ भइया... हम आजाद हैं। बिल्कुल आजाद।

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