| ब्लॉग प्रेषक: | डॉ. अभिषेक कुमार |
| पद/पेशा: | साहित्यकार व विचारक |
| प्रेषण दिनांक: | 26-04-2026 |
| उम्र: | 36 |
| पता: | ठेकमा, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश |
| मोबाइल नंबर: | 9472351693 |
छिपकली कभी मगरमच्छ नहीं हो सकती..!
© आलेख: डॉ. अभिषेक कुमार
हमारे एक सहकर्मी का एक वाक्य मुझे चिंतनशील कर दिया और कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया। जब उन्होंने किसी बात पर कहा की छिपकल्ली को नदी में डाल देने से वह मगरमच्छ नहीं बन सकती..!
दीवारों पर चिपकी हुई खूबसूरत लगती छिपकलियों की कार्यकुशलता नदी में तैरती मगरमच्छों भर उम्मीदें करना क्या नाइंसाफी नहीं है..!
कहते हैं – “छिपकली को नदी में डाल देने से वह मगरमच्छ नहीं बन सकती।” यह उक्ति केवल प्राणी विज्ञान की सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि आज के दफ्तरों, संस्थानों और संगठनों की वास्तविकताओं का दर्पण भी है। जब किसी कार्यालय में क्षमता-विहीन व्यक्ति को भाग्योदय के आधार पर चयन या मजबूरी अथवा प्रतिस्पर्धा में कमी के कारण चयन या अनुशासन, वरिष्ठता या सिफ़ारिश के बल पर ऐसे पद पर बिठा दिया जाता है, जहाँ कौशल, दूरदृष्टि और निर्णय क्षमता अपेक्षित नहीं होती है, तो परिणामस्वरूप पूरा तंत्र एक अदृश्य जड़ता में फँस जाता है।
आधुनिक कार्यसंस्कृति में दक्षता केवल उपस्थिति दर्ज कराने, दिन भर बिना कोई कार्य किए ईमानदारी पूर्वक केवल ड्यूटी निभाने या फाइलों के हस्ताक्षर भर से नहीं नापी जा सकती। कार्य सामर्थ्य ऊर्जा, उच्च दृष्टिकोण और प्रबंधन कौशल का संयोजन है। परंतु कई संस्थानों में देखा गया है कि जहां सक्रिय सोच, तकनीकी समझ और नेतृत्व क्षमता की आवश्यकता होती है, वहां नियुक्त व्यक्ति केवल अपनी निरर्थक उपस्थिति से ही संस्थान का “सजावटी मगरमच्छ” बनकर रह जाता है।
नदी में तैरना और जीवन जीना दो अलग बातें हैं। उसी प्रकार, कार्यस्थल में पद पर बने रहना और वास्तविक योगदान देना भी दो पृथक स्थितियाँ हैं।
जब किसी विभाग में ऐसी “छिपकलियाँ” बड़ी जिम्मेदारियों की कुर्सी पर विराजमान होती हैं, तो नवाचार की धारा सूखने लगती है। निर्णय प्रक्रिया धीमी हो जाती है, और जो लोग कार्य के प्रति समर्पित हैं, वे भी धीरे-धीरे उस वातावरण में अपनी ऊर्जा खोने लगते हैं। यह स्थिति केवल व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि संगठनात्मक संस्कृति के लिए विष समान होती है।
जहाँ प्रेरणा होनी चाहिए, सकारात्मकता होनी चाहिए वहाँ शिकवा, शिकायत, कामचोरी, राजनीति और भ्रम का माहौल व्याप्त हो जाता है। कार्यों की प्राथमिकता नहीं, बल्कि कामचोरी व काम न करने के सौ बहने तथा व्यक्ति की व्यक्तिगत सुविधा सर्वोपरि हो जाती है। ऐसे में न तो योजनाएँ समय पर पूर्ण होती हैं, न ही परिणाम अपेक्षित स्तर तक पहुँचते हैं। सतह के ऊपर नाविक केवल डांट पर डांट सुनता रहता है।
यही वह बिंदु है जहाँ “मगरमच्छ जैसे कार्य शक्ति का भ्रम” संगठन को भीतर से खोखला करने लगता है। दफ्तर के गलियारों में योजनाएँ बनती हैं, रिपोर्टें सजती हैं, और प्रस्तुतियाँ दी जाती हैं, परंतु वास्तविक क्रियान्वयन का प्रवाह ठहर जाता है। कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यह भ्रम रहता है कि केवल पद की ऊँचाई ही उसकी योग्यता का प्रमाण है। किंतु सत्य यह है कि पद की गरिमा व्यक्ति के कर्म से बनती है, न कि व्यक्ति पद से।
कुशल नेतृत्व का सार यही है कि वह अपने अधीनस्थों में कार्य-ऊर्जा, आत्मविश्वास और नवीनता का संचार करे। परंतु जब नेतृत्व का स्थान “नकल-प्रेरित” या “औपचारिक” हो जाता है, तब संस्थान में ठहराव, असंतोष और निरर्थक औपचारिकताएँ जन्म लेती हैं। यह स्थिति वैसी ही है जैसे किसी नदी में मगरमच्छ के स्थान पर छिपकली को छोड़ देना—दिखने में तो प्राणी है, पर प्रकृति और प्रवृत्ति दोनों भिन्न-भिन्न हैं।
इस व्यंग्य का सार यह नहीं कि हर अयोग्य व्यक्ति को नकारा जाए, बल्कि यह समझने की आवश्यकता है कि प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता का सही मूल्यांकन और उसके अनुरूप कार्य-आवंटन ही किसी संगठन की ऊर्जा का मूल पहलू है। नदी में केवल वही जीव फलता है, जो तैरना जानता है; और दफ्तर में केवल वही व्यक्ति प्रगति करता है, जो कर्म, कौशल और कर्तव्य को एकाकार कर देता है।
अतः आवश्यक है कि कर्मी का चयन हिसाब किताब समसामयिकी वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी के आधार न होकर कार्य सामर्थ्य ऊर्जा और असल अनुभव, कौशल के आधार पर हो तथा पद-स्थापन योग्यता के आधार पर हो, न कि संबंध, वरिष्ठता या सुविधा के आधार पर। वरना यह प्रशासनिक छिपकलियाँ, भले ही मगरमच्छ की मुद्रा में बैठी रहें, मगर न कार्य की लहरें उठा पाएँगी, न प्रगति की धारा बहा पाएँगी। अर्थात सरल शब्दों में जिसकी भुजाओं में ताकत नहीं है, मन में उत्साह, उमंग, जुनून नहीं है वैसे लोग छिपकल्ली स्वरूप किसी दीवार के कोने में खूबसूरत लग सकते हैं। उनसे किसी समर में मगरमच्छ के सामान बलशाली समझ पाना मूर्खता है।
संस्थानों की सफलता तब ही संभव है जब उनमें कर्मठता को प्रतिष्ठा मिले और पदभार को पात्रता के अनुरूप बाँटा जाए। अन्यथा “छिपकली की यह नदीय यात्रा” केवल हास्य का विषय बनकर रह जाएगी- मगरमच्छ बनने की असफल आकांक्षा की एक जीवंत मिसाल।
मेरा मकसद किसी ऐसे कर्मी के निजीगत स्वैच्छिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। यदि किसी को पहुंचती है तो हृदय से क्षमा प्रार्थी हैं।
डॉ. अभिषेक कुमार
साहित्यकार व विचारक
मुख्य प्रबंध निदेशक
दिव्य प्रेरक कहानियाँ मानवता अनुसंधान केंद्र
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