| ब्लॉग प्रेषक: | डॉ. अभिषेक कुमार |
| पद/पेशा: | साहित्यकार व विचारक |
| प्रेषण दिनांक: | 26-04-2026 |
| उम्र: | 36 |
| पता: | ठेकमा, आजमगढ़ |
| मोबाइल नंबर: | 9472351693 |
नींद में लिपटे सैनिक और जागता हुआ सेनापति..
~डॉ. अभिषेक कुमार
बात-बात पर हमने, अपने एक अधीनस्थ कर्मी से बोला की इस बार ब्लॉक प्रबंधक की नियुक्ति आएगी तो फॉर्म अप्लाई कर देना... वह बोली न बाबा न मुझे ऐसा सेनापति नहीं बनना जिसके सैनिक सोए हुए रहते..! हमने बोला सेनापति के सम्मानित उपाधि से ब्लॉक प्रबंधक के पद को न नवाजों... मैं भी अपने ब्लॉक का प्रबंधक जरूर हूँ। पद और जिम्मेदारी के हिसाब से सेनापति कह सकती हो, पर व्यवहार जगत और असल में वॉचमैन हूं। मैं दिन रात जागता हूं और हमारी सेना दिन-दहाड़े गहरी समाधि में लीन रहती है। सामने लक्ष्य कठिन और विशाल है पर हमारे सैनिक कर्म भूमि में नहीं प्रशांत महासागर के गहरे तल पर नींद के आगोश में हैं।
मेरे कलस्टर लेवल के कर्मचारी बड़े प्रतिभाशाली हैं। काम को हाथ लगाए बिना ही थक जाने की अद्भुत कला इनमें कब से है वह तो मुझे नहीं पता पर इतना पता जरूर है कि इन्हें देख के कोई नहीं कह सकता कि ये कर्मयोगी नहीं है। ये दफ़्तर आते हैं, आसन सँभालते हैं, मोबाइल खोलते हैं, लॉगिन लॉगआउट करते करते तथा समूह दीदियों से वार्तालाप और फिर *“ड्यूटी टाइम पास”* नामक महान अनुष्ठान में लीन हो जाते हैं। मुझे विश्वास है इसी प्रकार यज्ञ-अनुष्ठान होता रहे तो यजुर्वेद की संपूर्ण सिद्धि प्राप्त हो कर रहेगी।
हमारी सेना रोज़मर्रा के आसान लक्ष्य पूर्ति करने में विश्वास नहीं रखते। ये सभी एवरेस्ट के ऊंचाई पर चढ़ने वाले महान बलशाली लोग हैं। रोजमर्रा के कार्य न होने पर एक दिन जब वह बादल फटने जैसे आपदा बन कर कहर ढाता है अर्थात उच्चाधिकारी का दौरा होता है तब ये प्रगाढ़ निद्रा से थोड़ी सुगबुगाते हैं, फिर सो जाते हैं। कुछ तो ऑफिस बंद कर भाग जाते हैं। इस आपदा में धज्जियां उड़ जाती है और बह जाता है हम बेचारे प्रबंधकों की अरमान और पूरे महीने की सैलरी..
इनकी बहाना-फैक्ट्री का क्या जलवा वह शेयर बाजार में मजबूत स्थिति में सदैव रहती है।
एक बोले—
“सर, फील्ड में घर -घर जाने पर भी कोई नहीं मिलता..!” काहे कोई मिलेगा सब सात समुंदर पार इंग्लैंड जो गए हैं।
दूसरा कहे—
“सर, समूह सखी सहयोग नहीं कर रही।” ऊ काहे करेगी जब असहयोग आंदोलन में वह पहले ही प्रतिभागी बन चुकी है।
तीसरा बोले—
“सर, कोई समूह दीदी आधार कार्ड, ओटीपी नहीं दे रही..! अरे ऊ काहे देगी जब वह आपको पहचानती ही नहीं..? बीस से पच्चीस ग्राम की मौजा मिली थी दायित्व निभाने की वह न करके ऑफिस में कुर्सी तोड़ते रहे तो कोई कैसे पहचानेगा..?
चौथा बोली..
अरे सर पूर्व वाले लेखाकार भैया रजिस्टर ठीक से नहीं लिखे तो हम क्या खाक इसे अब ठीक से आगे लिखें..? ज्यादा आप ज्ञान मत दीजिए जैसे चल रहा वैसे चलने दीजिए। ठीक है.. नौ महीना से उनकी नाकामयाबी के शीर्ष प्राथमिकता में अपनी कामचोरी को छुपाए रखना एक महान त्याग और परिश्रम से कम है..? इसके लिए तो नोवेल पुरस्कार मिलना ही चाहिए..!
मतलब साफ़—काम तब होगा जब सब कुछ परफेक्ट होगा,
और परफेक्शन यहाँ वही है—काम न करना।
इनके पास बहानों का इतना समृद्ध भंडार है कि अगर इसे सरकारी योजना बना दिया जाए, तो बेरोज़गारी अपने आप स्वत: ख़त्म हो जाएगी।
कुछ छोटे से छोटे कार्य करने को कहना या रिपोर्ट मांगने जैसी हरकत यह अन्याय की उच्चतम पराकाष्ठा है।
जैसे ही मैं कहता हूँ—“रिपोर्ट दीजिए”,
हमारे कर्मचारियों के चेहरे ऐसे लटक जाते हैं जैसे बोर्ड की परीक्षा में थर्ड डिविजन आया हो। हमारे वरिष्ठ ब्लॉक प्रबंधक ने कहा कि आप रिपोर्ट मांग के व्यर्थ अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं, आपको.. उनकी ड्यूटी प्रारंभ और समापन टाइम का लोकेशन ठीक से मिल जाए वहीं ढेर है।
छोटे मोटे कार्य भी मजाल है कि वह सरल संपादित हो जाए, एक -दो दिन बीत जाए तो काहे की उसकी फिर पुनः याद आए। जो बीत गया सो बात गई।
हमारे सैनिक रिपोर्ट को भविष्य की धरोहर मानते हैं—
उसे आज नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं।
काम के प्रति इनकी उदासीनता इतनी गहरी है कि अगर इन्हें प्रेरक वक्तव्यों को सुनाया जाए, तो कोई बात नहीं सुन लेंगे... पल्ले थोड़े ही कुछ पड़ने वाला है। विभागीय काम को देखकर इनके मन में वही भावना आती है जब कोई व्यक्ति किसी के बिना कारण अपशब्दों से नवाजे।
लेकिन इस महासमर में एक दीपक, उम्मीद की रोशनी भी है।
वह एक बच्ची है—जो भूख, प्यास को तिलांजलि देकर बिना बहाना बनाए, बिना बहस किए, बिना विलंब, ईमानदारी पूर्वक काम करती रहती है चाहे जो जिम्मेदारी दे दिया जाए।
न उसका नेटवर्क जाता है, न उसका मन बोझिल होता है। वह दिए हुए कार्यों को निपटाने में ईमानदारी से तल्लीन रहती है। बीच में कुछ कहिए तो वह सुनेगी नहीं, या जानबूझकर गुस्से में अनसुना करती है यह वही जाने। पर उसके अपने एक स्वाभिमान, वसूल है, कार्य सामर्थ्य ऊर्जा है, एक सकारात्मक सोच है जो सराहनीय है।
वह रिपोर्ट भी देती है, काम भी करती है, और हैरानी की बात यह कि बिना याद दिलाए! उसे देखकर लगता है कि अभी सिस्टम पूरी तरह मरा नहीं है—बस ICU में है। भगवान जाने कौन दवाई से हमारे अन्य सैनिक ICU से बाहर आएंगे।
मैं सेनापति हूँ, आदेश छोड़िए.. मेरी सेना अनुनय -विनय, अनुरोध पर भी नहीं, मूड पर चलती है। उच्चाधिकारी के निर्देश पर नहीं ब्रह्मांड के आदेश पर डोलती है।
ये अटलांटिक महासागर पार करने समान कठिन और विशाल लक्ष्य नहीं देखते, सिर्फ़ घड़ी और महीना देखते हैं। वेतन प्राप्ति से मतलब है बाकी के चिंता BMM भैया करें हम काहे करें..!
हमारे सैनिकों के अतः करण में चलता रहता है कि हम सभी कितना मेहनत करते हैं फिर भी हमलोग के ऊपर वाले डांटते फटकारते रहते हैं।
“हमलोग ने कितना काम किया है फिर भी कोई नाम नहीं लेता।”
हाँ, बहुत काम किया—काम से बचने का..! और देर-सबेर रोज ऑफिस आना-जाना भी कम महान कार्य थोड़े ही है।
अंत की सीख (हँसते-हँसते सोचने वाली):
सेना में गिनती नहीं, नीयत काम आती है।
एक जागता वॉचमैन, सौ खर्राटे लेते सिपाहियों को अपनी मौजूदगी तक दूसरे ग्रहों के उल्का पिंड, झंझावात से बचा के रखेगा। आवश्यकता पड़ने पर और भी वेतन भत्ता बढ़ा देगा।
कर्मचारियों के संख्या ज्यादा होना ताकत नहीं होती। ताकत होती है नैतिकता, ईमानदारी से दायित्व का निर्वहन।
जो समय पास करता है, वक़्त एक दिन उसे पास कर देता है। हम जब थाईलैंड के यात्रा पर थे तो वहां के कर्मचारियों में अपने पद एवं दायित्व के प्रति गजब के निष्ठा देखा.. और अपने अधीनस्थ कर्मचारियों में गजब के प्रगाढ़ निद्रा पाया।
अंत में मेरी सीख यही है जो आप सभी से निवेदन करना चाहूंगा- जीवन में उसी को समझने/जगाने का प्रयास किया जाए जो समझने/जागने को तैयार है। जो समझ कर बैठा है कि मुझे समझना/जागना नहीं है उसे भगवानों समझा/जगा नहीं सकते..! वहां उसको न समझाया जाए, अपने आप को समझा लिया जाए। इसी में शांति, उन्नति और लक्ष्य पूर्ति है।
इस आलेख के जरिय हमारा मकसद किसी के निजीगत स्वैच्छिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। यह आलेख काल्पनिक, मनगढ़ंत और बनावटी है जो वर्तमान सत्य से कोई ताल्लुक नहीं रखता। यदि इसके पात्र और परिस्थितियां कहीं मेल खाती है तो वह मात्र एक संयोग होगा।
सबका मंगल... सबका भला...
डॉ. अभिषेक कुमार
साहित्यकार व विचारक
श्रेणी:
— आपको यह ब्लॉग पोस्ट भी प्रेरक लग सकता है।
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