आ बैल मुझे मार !

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ब्लॉग प्रेषक: राजीव भारद्वाज
पद/पेशा: व्यंग्यकार
प्रेषण दिनांक: 23-03-2026
उम्र: 38
पता: Nawada
मोबाइल नंबर: 9006726655

आ बैल मुझे मार !

ट्रंप चाचा, ओ भाऊ श्री वाले ट्रंप चाचा। एगो सलाह दें, अगर बम काम नहीं कर रहा है तो क्यों नहीं हमरा देश से एकाध दर्जन डायन मंगवा लेते हो। भारत में इसका जबरदस्त क्रेज है। आऊ त आऊ, मारन क्षमता भी एकदम गारंटेड है। इसके साथ साथ हमरा देश में मुंहनोछवा, चोटीकटवा, बच्चाचोर भी बहुयातक मात्रा में है। चचा, इनमें खर्चा भी कम है। 

भूत तो सुने ही होंगे, हमरा देश में पांच छः लाख भूत रोज किसी न किसी मंदिर में दरसते मिल जाएगा, ले जाइए सब को। पहना दीजिए वर्दी, उतार दीजिए ईरान में। फिर देखिए कमाल। बमबारी से ज्यादा कारगर रहेगा सब। ई सब सदियों से हमर देश के कई गो घर खा गया। अगर जोड़िएगा तो ईरान के जनसंख्या से जादे हो जाएगा। 

अगर ये सब कम पड़ जाए तो नागा साधु, जंगल में रहने वाले वामपंथी, बेरोजगार युवक जो हर दिन कहीं न कहीं रोड पर चंदा मांगते नजर आते हैं, सबको अपने मित्र मोदी जी से मांग कर ले जाइए। युद्ध तीन दिन में जीत जाएंगे।ट्रंप चा 'योर प्रोग्राम इज़ टोटली फुस्स'। लगे रहो, हार जीत तो होती रहती है।  ट्रंप चा, तुमने हमारे यहाँ की एक कहावत सुनी कि नहीं, सोचा तुम्हें आगाह कर दें, जानते हो वह कहावत क्या है? नहीं ना, तो सुनो, 'सुंग का धन शैतान खाता है'। ध्यान रखना ऐसा न हो 'स्ट्रा' लगाकर तुम्हारा हितैषी, परम मित्र इजरायल कुओं का सारा तेल पी जाए। और तुम ईरान के साथ आइस–पाइस खेलते रह जाओ। वैसे भी 'आई टेल यू वन थिंग. . .ये ईरान भी बड़ा घाघ है। हर खेल में 'अव्वल'! कई बार तुम्हें टीप मार कर भाग चुका है और तुम हो कि भागते भूत की लंगोट भली. . .यही रट लगाए हो। कैलकुलेशन तो तगड़ी लगाई है। ईरान से कौन-सा फ़ायदा, कल भागता हो तो आज ही भागे तुम्हारी तो बल्ले–बल्ले कुओं में हैं। एम आई राइट ना? पर चाचा तुम हो वहीं, नहीं समझे ना! हमारे यहाँ तुम जैसों को 'चालाक कौव्वा' कहते हैं।


सुना है तुमने अब तक ईरान के यहाँ 500 टन से भी ज़्यादा वजन के क्लस्टर बम गिराए लेकिन मामला टॉय–टॉय फिस्स. . . क्या हुआ कुछ मिला? मुझ पर भरोसा करते, मुझे अपना समझते, तो ना मुझसे कहते! अरे एक बार कह कर तो देखते, अपने यहाँ से ' अपने कंपनी का बॉस' सप्लाई कर देता। टारगेट को टारगेट देकर फौरन वापस रवानगी। मनी और टाइम दोनों सेव। किसी को कानो–कान ख़बर तक न होती और तुम्हारा काम फिट्टूश झक्कास। विश्वास नहीं होता मेरी बात पर तो पूछ लो मीडिया से। मेरी बात ग़लत निकल जाए न तो तुम्हें अपना बॉस फ्री गिफ्ट कर दूँ।


 लिफ़ाफ़ा देखकर ही मजमून भाँप लेना अपनी आदत में शुमार है। फिर काहे हम कहें आ बैल मुझे मार। ये सबक तो हमने बचपन में ही अपनी गाँठ बाँध लिया था। हमारी दादी हमें सोने से पहले रोज़ कहानी सुनाया करती थीं। उन्होंने एक बार भगवान शंकर की एक कहानी हमें सुनाई—

हुआ यों कि एक राक्षस था। उसने अपने जप–तप से भगवान भोले शंकर को प्रसन्न कर लिया तो भगवान ने उसे वरदान माँगने को कहा। उसने प्रभू से कहा कि हे भगवान! यदि आप मुझसे प्रसन्न होकर मुझे वरदान देना चाहते हैं तो मुझे यह वर दे कि मैं जिस वस्तु पर अपना हाथ रख दूँ, वह भस्म हो जाए। भगवान ने तथास्तु! कह उसे वरदान दे दिया। अब वह राक्षस भोले शंकर के ही पीछे पड़ गया, दिया हुआ वरदान शंकर जी के लिए ही भारी पड़ने लगा। अपनी रक्षा के लिए वह भाग ही रहे थे, कि श्री हरि विष्णु की दृष्टि उन पर पड़ी तो वे विश्वमोहिनी का रूप धारण कर राक्षस के सामने आ गए। अति सुंदर स्त्री का सौंदर्य देख राक्षस भगवान शंकर को भूल कर वही रह गया, और उसने विवाह का प्रस्ताव रखा। इस पर स्त्री का रूप धारण किए भगवान विष्णु ने उससे कहा, ''मैं तभी तुमसे विवाह करूँगी जब तुम मेरी तरह नृत्य करोगे। राक्षस उसी प्रकार नृत्य करने लगा। जब वह पूर्ण रूप से नृत्य में तल्लीन हो गया तब भगवान विष्णु ने अपना एक हाथ अपने सिर पर रखा। तो उनकी देखा–देखी जैसे ही भस्मासुर ने अपना एक हाथ सिर पर रखा वैसे ही वरदान के प्रभाव से वह भस्म हो गया। तो भइये इस तरह भगवान शंकर के प्राण बचे। इसीलिए फालतू जान संकट में डालना अपने को पसंद नहीं फिर किसी और के लिए 'नो चांस'। वैसे चाचा! तुम्हें भी भगवान शंकर से तो नहीं लेकिन भस्मासुर से थोड़ी शिक्षा लेनी चाहिए, तुम्हारे लिए बहुत काम आएगी। मैं कोई दबाव नहीं डाल रहा, फिर भी समय निकाल कर मेरी बात पर ग़ौर करना, तुम्हें लगेगा कि मेरी बात में वज़न है। फिलहाल तुम्हारी मर्ज़ी जैसा चाहो वैसा करो।

एक उपाय आऊ है, कल ही बेवड़े की एक टोली मदिरापान के बाद ईरान को पेलने निकल गया था, लेकिन बीच रास्ते में थानेदार ने सबको समझा बुझा के घर वापसी करा दी। यकीन मानिए यदि वो चले जाते तो मामला कल शाम तक ही सेट हो जाता खैर, पियांक तो तुम भी हो ट्रंप चा, वरना होश में कौन ऐसा करता है। न जी! शांति का नोबल नहीं मिलेगा तो अशांति फैलाते चलोगे। खैर हम ई सुना है कि ढिबरी के दिया बुझने से पहले फड़फड़ाता बहुत है। एक बात और धुरंधर देखे कि नहीं, अपना जसकीरत तुम्हारे पसंदीदा देश को जबरदस्त पेल कर भारत लौट गया है, कहो तो उसी को भेज दें। सफलता की सौ प्रतिशत गारंटी।

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