| ब्लॉग प्रेषक: | राजीव भारद्वाज |
| पद/पेशा: | व्यंग्यकार |
| प्रेषण दिनांक: | 29-05-2026 |
| उम्र: | 40 |
| पता: | गढ़वा |
| मोबाइल नंबर: | 9006726655 |
मजनू भाई का नया शाहकार।
खैनी रगड़ते हुए मधेसर चा बोले, देख रहे हो बगेदन - दीवार पर ऊपर गाँधी जी मुस्कुरा रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे कह रहे हों “हे राम, का यही सब के लिए हम अंग्रेज को यहां से भगाएं थे?” बगल में राष्ट्रपति जी शांति से देख रही हैं, जैसे उनका अगला पद्मश्री साक्षात् नजर आ गया हो।और प्रधानमंत्री जी के फोटो में वही परिचित मुस्कान जो नोटबंदी के घोषणा के समय थी। लेकिन असली कथा नीचे चल रही है। एक तरफ नेता जी, पूरा भगवा आभामंडल ओढ़े, ऐसे फ्रेम पकड़ रहे हैं जैसे देश का भविष्य अभी-अभी ड्राइंग शीट पर बनकर आया हो। दूसरी तरफ कलाकार बाबू! साक्षात् लियोनार्डो द विंची का विष्णु रूपी अवतार। अरे बाप रे! गले में इतना सोना किअगर बिजली चली जाए तो मोहल्ला उसी से रोशन हो जाए। चश्मा ऐसा कि उसमें लोकतंत्र का रिफ्लेक्शन दिख जाए। कोट ऐसा कि लग रहा है सीधे “सम्मान समारोह” से निकलकर “रियलिटी शो” में जाने वाले हैं। एकदम हकीम एम् आलम, गुप्त रोग विशेषज्ञ जैसा। चित्र में मर्दाना को मर्दाना कमजोरी जैसा दिखाना कहां उचित है बे। जो चित्र भेंट किया जा रहा है, उसे देखकर लग रहा है कि कलाकार ने चेहरा कम, भावना ज्यादा बना दी है। मगही में कहें तऽ—“ई फोटो देखके त आदमी खुद पूछ दे—भाई, ई हमहीं हैं कि आधार कार्ड वाला हमर बाबूजी?” चित्र में चेहरा इतना रहस्यमय है कि खुद चित्र भी सोच रहा होगा—“हम आखिर किसके सम्मान में बने हैं?” नेता जी शायद मन में सोच रहे होंगे— “चेहरा चाहे मिले न मिले, भावना राष्ट्रवादी होनी चाहिए!” और कलाकार बाबू का आत्मविश्वास देखिए— ऐसे गर्व से फ्रेम पकड़े हैं जैसे मोनालिसा के छोटे भाई को खुद खोज निकाले हों। आजकल कला में समानता जरूरी नहीं रही। बस फ्रेम बड़ा होना चाहिए,फोटो सही एंगल से खिंचना चाहिए, और पीछे बड़ी हस्तियों की तस्वीर होनी चाहिए। बाकी जनता खुद भावुक हो जाती है। पहिले जमाना में लोग बोलता था— “चित्र हूबहू बनाओ।” अब जमाना बदल गया है।अब कलाकार बोलता है—“सर, हूबहू नहीं… विचारधारा पकड़िए!”ऊ चित्र में मुख्यमंत्री जी का चेहरा कम, संघर्ष ज्यादा दिख रहा है।नाक कहीं जा रही है, दाढ़ी कहीं जा रही है, आँखें तो ऐसा लग रहा है जैसे सरकारी योजना का लाभ प्रतिशत खोज रही हों। लेकिन फोटो खिंचाते समय दोनों के चेहरे पर जो गर्व है, उसे देखकर लगता है कि कला का असली उद्देश्य अब सुंदरता नहीं, “सोशल मीडिया पोस्ट” है। कैप्शन भी लगभग तय है— “माननीय जी को अपनी कला भेंट करते हुए।” नीचे सौ लोग लिखेंगे—“वाह!” “अद्भुत!”“गर्व का क्षण!” और अंदर ही अंदर सब सोचेंगे— ई मजनू भाई कब तक बवासीर बनाते रहेंगे। मजनू मजनू, फंस गया रे देखो मजनू मजनू।
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