ज्ञाता

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ब्लॉग प्रेषक: राजीव भारद्वाज
पद/पेशा: व्यंग्यकार
प्रेषण दिनांक: 15-10-2026
उम्र: 38
पता: गढ़वा
मोबाइल नंबर: 9006726655

ज्ञाता

हे त्रिपाद चालक संपूर्ण मेदिनीनगर भ्रमण मे कितनी मुद्राएं व्यय करनी होगी, एक रिक्शा चालक को तथाकथित परम ज्ञानी शिक्षक महोदय ने कहा तो रिक्शा चालक ने जवाब दिया " गाली मत दो नहीं तो मार के मुँहवा रंग देबऊ। परम ज्ञानी शिक्षक ने सोचा मैने ऐसा क्या कह दिया जो ये नाराज हो गया। क्या ज्ञान का प्रदर्शन सार्वजनिक स्थल पर निषेद्य है। खैर,

 मैला-कुचैला आकाश, पलामू की तपन और झरीवा की चौपाल पर नीम की घनी छाँव! उस रोज बिसुनपुर के हाईस्कूल वाले मैदान में एक जलसा बैठा था। उस जलसे में मुझ अज्ञानी को मंच संचालन की जिम्मेदारी मिली, अब मैं अबोध, अज्ञानी इतने विद्वानों के सामने क्या बोलता, लेकिन फिर भी बोलना शुरू किया, आम बातचीत की शैली में, बीच बीच में हँस भी देता

 फिर मैने उन मास्टर साहब को मंच पर उवाचने के लिए बुलाया। मास्टर साहब, यानी वही प्रखर-प्रज्ञा-प्रगल्भ जी, जिनको रिक्शा वाले ने झिड़क दिया था, माइक के सामने ऐसे सीना ताने खड़े थे मानो सारी दुनिया के 'वैचारिक संश्लेषण' का ठेका अकेले उन्हीं की चौड़े पाटे वाली छाती पर लिखा हो।

नाक पर सोने के फ्रेम वाला चश्मा, माथे पर गोबर-चंदन की मोटी रेखा और मुँह से ऐसे हिंदी के भारी-भरकम और सड़े-गले शब्द टपक रहे थे, जिन्हें सुनकर कौए भी काँव-काँव करना भूलकर अचरज से ताकने लगें। मास्टर साहब ने माइक को चूमते हुए अपनी बाल्टी-भर विद्वता उँडेलनी शुरू की

"हे कलुषित चेतना के संवाहक पामरों! तुम्हारी यह मतिमंद बुद्धि सांस्कृतिक अवनति के गर्त में गोते लगा रही है...। सुनो अज्ञानी! जिस मंच पर सरस्वती का वास होना चाहिए, वहाँ तुम्हारा यह निरर्थक प्रलाप हमारी कानों के लिए असह्य पीड़ा बन चुका है। तुम शब्ददरिद्र हो! भाषा की गरिमा से अनभिज्ञ होकर व्यर्थ का दंभ पालना छोड़ो और इस पवित्र मंच को अपने इस अशुद्ध उच्चारण से दूषित करना बंद करो!"


सभा में सन्नाटा पसर गया। लोग एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे कि मास्टर साहब सुबह-सुबह कौन-सी पारलौकिक जुबान बोल रहे हैं। तभी पीछे से खटिया पर बैठे भगीरथ चौधरी ने अपनी दातुन थूकते हुए हुक्का गुड़गुड़ाया और बोले

"अरे मास्टर साब! ज़रा देहाती जुबान में भी बतियाओ। इतना भारी-भरकम लाठी जैसा शब्द एक साथ पटकोगे, तो गाँव के कच्चे घरों की दीवारें ढह जाएंगी! आखिर कहना क्या चाहते हो, साफ-साफ कहो न?"

मास्टर साहब ने भगीरथ को ऐसे देखा जैसे कोई दरोगा किसी फरार मुजरिम को घूरता है। नाक सिकोड़कर बोले—

"अल्पज्ञानी शूद्रों से संवाद करना अपनी मेधा का अपमान है!"

मंच के कोने में बैठे थे छग्गू बाबू। छग्गू बाबू मास्टर साहब की साँस की आवाज से उनका अगला भाषण भाप लेने वाले आदमियों में थे। मास्टर साहब ने खाँसा, तो छग्गू की त्योरियाँ चढ़ गईं; मास्टर साहब ने भौंहें मकाईं, तो छग्गू ने ऐसे ताली बजाई जैसे अभी-अभी कोई सातवाँ आसमान जीत लिया हो।

बोले— "अरे भगीरथ! तुम क्या जानो? यह साधारण बतकही नहीं है, यह 'पारलौकिक वाग्मिता' का अद्भुत नज़ारा है। गुरुजी की बुद्धि तो बृहस्पति को भी पीछे छोड़ दे!"

मास्टर साहब गदगद हो गए। छग्गू की पीठ पर हाथ फेरते हुए बोले

"संसार में बस एक यही जीव है जो हमारी मेधा को परख सकता है। बाकी सब तो इस धरा पर केवल अज्ञान का बोझ ढो रहे हैं।"

छग्गू ने मूँछों पर ताव देते हुए फिर से अपनी चमची बजाई। जलसे में बैठे लोग अब मास्टर-चेले के इस तमाशे को नौटंकी की तरह देखने लगे।

तभी भगीरथ चौधरी ने अपना मैला गमछा झाड़ा, ज़रा आगे खिसके और ठंढे कलेजे से बोले,

"साहब, मान लिया कि तुम बड़े पंडित हो और किताबें तुम्हारी मुट्ठी में हैं। पर ज़रा यह तो बताओ कि जो ज्ञान आदमी को नीम की छाँव में दो मीठे बोल बोलना न सिखाए, दूसरों को कीड़ा-मकोड़ा समझे, उस ज्ञान की गठरी का बाजार में भाव क्या है? खेत की मेड़ काटने वाला किसान भी जानता है कि माटी से जुड़कर कैसे जिया जाता है, और तुम हो कि कागज़ के पहाड़ों पर चढ़कर सबको अज्ञानी बता रहे हो।"

भगीरथ ने मुड़कर छग्गू की तरफ देखा और ताना मारा,

"और ओ छग्गू! गुरुजी गलत बोलें तब भी ताली बजाओगे? तुम शिष्य नहीं, चलते-फिरते ढोल हो, जिसे कोई भी पीटकर अपनी ताल बजा लेता है!" छग्गू की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसने अपनी चमची समेटी और खिसियानी बिल्ली की तरह कुर्सी में सिकुड़ गया।

मास्टर साहब का मुँह खुला का खुला रह गया। उनके सारे 'सांस्कृतिक उत्कर्ष' और 'बौद्धिक परिपक्वता' वाले शब्द हवा हो गए। मँझधार में फँसे जहाज़ की तरह वे माइक को देखने लगे।

भगीरथ ने उठते हुए आखिरी बात कही

"ज्ञानी वो नहीं जिसके आगे सब डर के मारे मूँह सी लें, ज्ञानी वो है जिसकी बात सुनकर बुझते हुए दीये जल उठें। बाक़ी, शब्दों का कबाड़ सजाकर ढोंग का महल बनाने वालों के लिए छग्गू जैसे चाटुकारों की इस दुनिया में कभी कमी नहीं रही!"

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