| ब्लॉग प्रेषक: | पंकज श्रीवास्तव |
| पद/पेशा: | सह संपादक, सुबह की धूप पत्रिका, पलामू झारखण्ड |
| प्रेषण दिनांक: | 09-08-2022 |
| उम्र: | 51 |
| पता: | गढ़वा, पलामू, झारखण्ड |
| मोबाइल नंबर: | +91 80928 82344 |
राष्ट्र ध्वज के संदर्भ में रोचक जानकारी
संदर्भ:हर घर तिरंगा अभियान
राष्ट्रध्वज का बदलता स्वरुप
वर्ष 1857के स्वतंत्रता संग्राम के समय भारत राष्ट्रध्वज बनाने की योजना बनी थी,लेकिन वह आंदोलन असमय ही समाप्त हो गया।राष्ट्रध्वज को वर्तमान स्वरूप मिलने के पहले यह प्रक्रिया कई चरणों से गुजरी।कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं :-
प्रथम ध्वज 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था,जिसे 7अगस्त,1906को पारसी बागान चौक( ग्रीनपार्क)कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन में फहराया गया।इस ध्वज को लाल,पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।ऊपर की हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद था।बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम् लिखा था।
द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम भीखाजी कामा और अन्य क्रांतिकारियों द्वारा 22अगस्त,1907को फहराया गया था।।यह भी पहले ध्वज के समान था;सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था,किंतु सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे।यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
1917में भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष ने निश्चय ही एक नया मोड़ लिया।डॉ॰ एनी बेसेंट और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने घरेलू शासन(होम रूल)आंदोलन के दौरान तृतीय ध्वज को फहराया।इस ध्वज में 5लाल और 4हरी क्षैतिज पट्टियाँ एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे।ऊपरी किनारे पर बायीं ओर(खंभे की ओर) यूनियन जैक था।कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में आंध्रप्रदेश के युवक पिंगली वेंकैया ने एक झंडा गांधीजी को दिया।यह दो रंगों-लाल और हरा-का था,जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता है।गांधीजी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 राष्ट्रध्वज के इतिहास का एक स्मरणीय वर्ष है।तिरंगा को राष्ट्रध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया।यह ध्वज,जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है-केसरिया,सफेद और मध्य में गांधीजी के चलते हुए चरखे के साथ था।यह स्पष्ट किया गया कि इसकी कोई साम्प्रदायिक प्रासंगिकता नहीं है।
22जुलाई,1947 को संविधान सभा ने वर्तमान ध्वज को राष्ट्रध्वज के रूप में अपनाया।इसमें केवल चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्मचक्र को स्थान दिया गया।इस प्रकार,तिरंगा नए भारत का राष्ट्रध्वज बना।
पांचों निर्मित झण्डे कुछ इस प्रकार हुए।
झंडा गीत
झण्डा गीत या ध्वज गीत की रचना श्यामलाल गुप्त पार्षद ने की थी।7पद वाले इस मूल गीत के तीन पद(पद संख्या 1,6 व 7) को संशोधित कर कांग्रेस ने ‘ध्वजगीत’ के रूप में इसे राष्ट्रीय गीत घोषित किया।
मूल झण्डा गीत
मूल रूप में लिखा गया झण्डा गीत इस प्रकार है:-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बरसाने वाला,
प्रेम सुधा सरसाने वाला,
वीरों को हरषाने वाला,
मातृभूमि का तन-मन सारा।। झंडा...।
स्वतंत्रता के भीषण रण में,
लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में,
कांपे शत्रु देखकर मन में,
मिट जाए भय संकट सारा।। झंडा...।
इस झंडे के नीचे निर्भय,
लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय,
बोलें भारत माता की जय,
स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा।। झंडा...।
एक साथ सब मिलकर गाओ,
प्यारा भारत देश हमारा।। झंडा...।
इसकी शान न जाने पाए,
चाहे जान भले ही जाए,
विश्व-विजय करके दिखलाएं,
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।। झंडा...।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
ध्वज गीत का इतिहास
"विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,झण्डा ऊँचा रहे हमारा" नामक उक्त सुविख्यात झण्डा गीत को 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वीकार किया गया था। इस गीत के रचनाकार श्यामलाल गुप्त'पार्षद'कानपुर के पास नरवल के रहने वाले थे।उनका जन्म 16सितंबर, 1893को वैश्य परिवार में हुआ था।गरीबी में भी उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की थी।उनमें देशभक्ति का अटूट जज्बा था,जिसे वह प्रायः अपनी ओजस्वी राष्ट्रीय कविताओं में व्यक्त करते थे।कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता रहने के बाद वह 1923में फतेहपुर के जिला कांग्रेस अध्यक्ष भी बने।वह 'सचिव' नामक एक अखबार भी निकालते थे।
जब यह लगने लगा कि अब आजादी अवश्यंभावी है,एक अलग “झण्डा गीत” की जरूरत महसूस की जाने लगी।गणेश शंकर विद्यार्थी पार्षदजी के काव्य-कौशल से अवगत थे,कायल थे।विद्यार्थीजी ने ही पार्षदजी से झण्डा गीत लिखने का अनुरोध किया। पार्षदजी कई दिनों तक कोशिश करते रहे,पर वह संतोषजनक झण्डा गीत नहीं लिख पाए।तब खीझकर विद्यार्थीजी ने पार्षदजी से साफ-साफ कह दिया कि उन्हें हर हाल में कल सुबह तक "झण्डा गीत" चाहिए।पार्षदजी ने आधी रात तक झण्डे पर एक नया गीत तो लिख डाला,लेकिन वह खुद उन्हें जम नहीं रहा था।निराश हो कर रात दो बजे जब वह सोने के लिए लेटे,अचानक उनके भीतर नये भाव उमड़ने लगे।वह उठकर नया गीत लिखने बैठ गये। पार्षदजी को लगा जैसे उनकी कलम अपने आप चल रही हो और 'भारत माता' उन से वह गीत लिखा रही हो। यह गीत था-*"विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।"* गीत लिख कर उन्हें बहुत सन्तोष मिला।
सुबह होते ही,पार्षदजी ने यह गीत 'विद्यार्थी'जी को भेज दिया,जो उन्हें बहुत पसन्द आया।जब यह गीत गांधीजी के पास गया,तो उन्होंने गीत को छोटा करने की सलाह दी।1938में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की अध्यक्षता में हुए हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में इसे देश के झण्डा गीत के रूप में स्वीकृति दी गई। 19फरवरी,1938को नेताजी ने झण्डारोहण किया और वहाँ मौजूद करीब पाँच हजार लोगों ने इसे एक सुर में गाया था।
पण्डित चन्द्रिका प्रसाद 'जिज्ञासु' द्वारा सम्पादित पुस्तक राष्ट्रीय झण्डा अथवा स्वदेशी खादी पर प्रतिबन्ध इसलिए लगा दिया गया था क्योँकि सम्पादक ने उस पुस्तक में इस गीत के पद क्रमांक 2 और 3 को छोड़कर केवल पाँच पद राष्ट्रीय झण्डा शीर्षक से छापे थे।यह पुस्तक राष्ट्रीय अभिलेखागार में प्रतिबन्धित साहित्य अवाप्ति क्रमांक 1679के अन्तर्गत आज भी सुरक्षित है।
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