| ब्लॉग प्रेषक: | दिव्यांजली वर्मा |
| पद/पेशा: | लेखिका |
| प्रेषण दिनांक: | 15-01-2023 |
| उम्र: | 27 |
| पता: | Shiv nagar ,ayodhya ,uttar pradesh |
| मोबाइल नंबर: | 8417935207 |
सुपर मैंन के साथ मकर संक्रांति
विषय- लोहड़ी पर्व या मकर संक्रांति
विधा- कहानी
आज मकर संक्रांति है। बहुत दिनों से मुझे इसी दिन का तो इंतजार था। क्योंकि आज के दिन जितना मर्जी पतंग उड़ाओ कोई कुछ नहीं कहता है। बाकी दिन तो जरा सा पतंग लेके छत पर क्या आओ। सब बोलने लगते है, चलो नीचे। पढ़ाई करो । पतंग नहीं उड़ाना है। चलो जल्दी। मगर आज एसा कुछ भी नहीं है।
दूसरी बात आज सब लोग नहाने भी गए हुए थे। क्या तो कहा था पापा ने की आज नहान है तो नहा के आयेगे। मुझसे भी कहा गया था लेकिन मैं नहीं गया। क्यों? अरे मुझे पतंग जो उड़ानी थी। चला जाता तो पतंग कैसे उड़ाता? तो सबके जाने के बाद मैंने गुड़ चुड़ा खाया। एक तिल का लड्डू मुह मे भरा और बाकी के जेब मे रख लिये जिससे पतंग उड़ाते समय भूख लगे तो खा सकूँ। फिर अपनी पतंग उठाई और आ गया छत पर।
मैं छत पर पतंग उड़ा रहा था। लेकिन मुझे मजा नहीं आ रही थी क्योंकि मेरा छत बहुत नीचे था। और आसपास के छत ऊपर थे। तो मैंने सोचा क्यों ना बगल वालीं बिल्डिंग के छत पर जाके पतंग उड़ा लू।
वो बिल्डिंग अभी पूरी तरह से बनी नहीं थी। केवल piller, छत और सीढिया ही तैयार थी। और आज मकर संक्रांति की छुट्टी के दिन कोई मजदूर भी नहीं आया था। तो मैं सोचा चलो वहीं से पतंग उड़ाते है । बहुत मजा आएगी। और मेरी पतंग सबसे उपर उड़ेगी।।
फिर मैं अपना परेता ,मांझा और पतंग उठाया और अपने दोस्त कल्लू से कहा, चल भाई वहां से पतंग उड़ायेगे,,,,,।
कल्लू भी मेरा चमचा था मना कैसे करता।
सच मे वहां से पतंग उड़ाने मे बहुत मजा आ रही थी। मेरी पतंग असमान मे सबसे ऊपर थी। मैंने खूब दूर पतंग बढ़ाया और दूसरे कॉलोनी के लड़कों की पतंग भी काट दी। मैंने जैसे पतंग काटी। कल्लू चिल्ला के बोला,,,, वा कटे,,,,,चड्ढी फटे,,,,,,।
ईतनी उपर तो पतंग भी कट कट के आ रही थी। मैं पतंग उड़ा रहा था और कल्लू मेरा यार कटी पतंग लूट रहा था। उसने बीस पतंग लूटी थी।मैंने भी 7 पतंग काटी थी।लेकिन मेरा मन नहीं भरा था। तो मैंने सोचा और पतंग काटता हू। इस बार मैंने एक नीली पतंग से पेचा लड़ाया। लेकिन उस पतंग का मांझा इतना जबर्दस्त था कि वो कट ही नहीं रहा था। जबकि बाकी पतंग तो छूते ही पुक्क (कट जाना) हो जा रही थी।
फिर मैंने लगाया अपना दांव पेंच। कभी ढील्लम,,, कभी घसीटम,,,,,कभी ढील्लम,,,,,कभी घसीटम,,,,,। लेकिन फिर भी नहीं कटी। तो पहले मैंने ढील दी और जैसे ही उस पतंग का मांझा मेरी पतंग के ऊपर आया मैंने मांझा खींचना शुरू कर दिया। मैं पूरी ताकत से मांझा खींचते हुए पीछे को जा रहा था।
मैंने पीछे नहीं देखा। और मांझा खींचते खींचते मैं किनारे तक आ गया। छत के किनारे खुले हुए थे। मैं छत से नीचे गिर गया। मैं उस 4 मंजिल की इमारत से नीचे गिर रहा था लेकिन तभी वहां सुपर मैन आ गया । और उसने मुझे बचा लिया। नहीं तो मैं गिर जाता और मुझे बहुत चोट आती।
मैंने तो सुपर मैन को केवल टीवी मे ही देखा था। लेकिन आज मैंने उसे सच मे देख लिया। मैंने सुपर मैन का शुक्रिया अदा किया। फिर सुपर मैन जाने लगा तो मैंने उसे रोका और कहा, सुपर मैन चलो मेरे घर मेरी मम्मी से मिलना।
फिर मैंने सुपर मैन को गुड़ चुड़ा खिलाया, तिल का लड्डू खिलाया, चाय भी पिलाई। मम्मी ने थोड़ा तिल का लड्डू बाँध के उसे दे दिया जिससे वो अपने घर ले जा सके। सुपर मैन को देखने पूरे मोहल्ले वाले मेरे घर आए थे । बहुत मजा आया मुझे तो। सुपर मैन ने तो मेरा ये वाला मकर संक्रांति यादगार बना दिया। मैंने तो सुपर मैन को पतंग उड़ाना भी सिखाया। हम लोग शाम तक खूब पतंग काटे । फिर रात होने से पहले सुपर मैंन अपने घर चला गया।
स्वरचित मौलिक रचना
बाल साहित्य
Divyanjli Verma
अयोध्या, उत्तर प्रदेश
श्रेणी:
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