| ब्लॉग प्रेषक: | सुषमा राज |
| पद/पेशा: | साहित्य कार |
| प्रेषण दिनांक: | 10-07-2025 |
| उम्र: | 40 |
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भाषा के आधार पर राज्य विभाजन
भारत की एक अनूठी विशेषता है जो इसे दुनिया में अलग पहचान दिलाती है। हमारे देश में "विविधता में एकता" का मतलब है कि विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं, धर्मों और परंपराओं के बावजूद, भारत एक राष्ट्र के रूप में एकजुट है। यह अवधारणा देश की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जो इसे दुनिया के सबसे अनोखे और जीवंत समाजों में से एक बनाती है, भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं और सैकड़ों बोलियाँ बोली जाती हैं।
किंतु कुछ दिनो से एक बार फिर भारत में भाषा के आधार पर राज्यों का विभाजन एवं निर्माण करने कि मांग की जा रही है, इसके पहले भी भारत में भाषा के आधार पर बनने वाला पहला राज्य आंध्र प्रदेश था, जिसका गठन 1 अक्टूबर, 1953 को हुआ था. इसे मद्रास राज्य से अलग करके बनाया गया था, और यह तेलुगु भाषी लोगों के लिए बनाया गया था.
आंध्र प्रदेश के गठन के लिए एक लंबा आंदोलन चला था, जिसमें प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी पोट्टी श्रीरामुलु ने 56 दिनों तक भूख हड़ताल की थी, जिसके बाद राज्य का गठन हुआ. इसके बाद, राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 के तहत, हैदराबाद प्रांत के तेलुगु बोलने वाले क्षेत्रों को भी आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया. राज्य पुनर्गठन अधिनियम 31 अगस्त 1956 को अधिनियमित किया गया था। तथा 1 नवंबर को इसके प्रभावी होने से पहले, भारत के संविधान में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया था। सातवें संशोधन के तहत, भाग ए, भाग बी, भाग सी और भाग डी राज्यों की मौजूदा शब्दावली को बदल दिया गया था।
भारत में स्वतंत्रता के बाद राज्यों का गठन, मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 द्वारा स्थापित। गोवा राज्य अधिनियम 1986 द्वारा स्थापित। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 द्वारा उत्तरांचल के रूप में स्थापित, बाद में 2007 में इसका नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया।
मुख्य रूप से कहा जाये तो प्रशासनिक सुविधा और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किया गया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि एक ही भाषा बोलने वाले लोग एक ही राज्य में रहें, जिससे प्रशासन और लोगों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो सके।
पर इसके दुष्परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं, जिसमें एक ही देश में रहने वालों को क्षेत्रीयतावादी झेलनी पड़ रही है,
"बैंगलौर जाना हो तो कन्नड़ सीखो
महाराष्ट्र जाना हो तो मराठी सीखो
चेन्नई जाना होतो तमिल सीखो
कश्मीर जाना हो तो कलमा सीखो"
हमारे यहां भले ही विभिन्न क्षेत्रों की अपनी अलग-अलग संस्कृतियाँ, परंपराएँ, और रीति-रिवाज हैं। विभिन्न धर्म, जाति, भाषा, और संस्कृतियों के लोग एक साथ रहते हैं, फिर भी वे एक राष्ट्र के रूप में एकजुट हैं
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, हिंदी ने हमें विश्व में एक नई पहचान दिलाई है। हिंदी विश्व में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में से एक है। विश्व की प्राचीन, समृद्ध और सरल भाषा होने के साथ-साथ हिंदीभाषा वह दुनियाभर में हमें सम्मान भी दिलाती है।
"वसुधैव कुटुंबकम" एक शक्तिशाली अवधारणा है जो वैश्विक स्तर पर एकता, सहयोग और सद्भाव को बढ़ावा देने में मदद करती है। यह हमें याद दिलाता है कि हम सभी एक ही मानव परिवार का हिस्सा हैं, और हमें एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि एक शांतिपूर्ण और समृद्ध दुनिया का निर्माण किया जा सके.
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