गड्ढा- ए- सड़क
छह महीने पहले मेरी पूरी बॉडी डायबिटीज के रंग में रंगी थी और आज पूरी बॉडी धूल में है। लेकिन मुझे बहुत खुशी है कि मेरा गढ़वा तरक्की के रास्ते पर चल पड़ा है। नवादा मोड़ से रंका मोड़ तक रास्ते में धूल ही धूल, गड्ढे ही गड्ढे हैं। शानदार गड्ढे—इतने शानदार कि आपको मसाज कराने की जरूरत ही न पड़े। बस सड़क पर निकल पड़िए और यदि संभव हो तो टोटो पर बैठ जाइए। शरीर की ऐसी कसरत हो जाएगी कि आप जिम जाना कभी पसंद नहीं करेंगे।
यदि आप मोटे पेट वाले हैं, तो इस रास्ते से दिन में दो बार गुजरिए। यकीन मानिए, धीरे-धीरे एक सप्ताह के भीतर आपकी सारी चर्बी गल जाएगी और आप छरहरे बदन के हो जाएंगे—इतने छरहरे कि आपको आपके घर वाले भी पहचान नहीं पाएंगे। तरक्की तो हो रही है। मैं शुक्रिया अदा करता हूं अपने जिले के सभी पदाधिकारियों का, जिन्होंने इस सड़क को हर जगह से खुदवाकर खुरदरा बना दिया है।
इस रोड पर चलने वाली महिलाओं को पिछले छह महीनों से ब्यूटी पार्लर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। सड़क पर निकलकर महिलाएं धूल से इतनी पुती जा रही हैं कि हर फाउंडेशन से ज्यादा गहरा रंग लग रहा है।
पंडिताइन जिद कर रही थीं कि मुझे ब्यूटी पार्लर ले चलो। विवश पति था, क्या करता—ले गया। वहां से निखरकर आईं, 2000 रुपये का बिल चुकाया, ऐश्वर्या जैसी दिख रही थीं। लेकिन जैसे ही घर पहुंचीं, वह ऐश्वर्या से ताड़का में परिवर्तित हो चुकी थीं। देखते ही मैं डर गया और उस दिन अलग कमरे में सोया।
हद तो तब हो गई जब सुबह-सुबह कार्यालय निकला। कार्यालय पहुंचा तो एक कर्मी ने मुझसे कहा कि बालों का यह भूरा रंग कहां मिलता है, गजब का शाइन दे रहा है। सच में, आंखों की पलकें तक भूरी हो गई थीं।
रामसेवक बाबू की पतोहू को बच्चा होने वाला था। अचानक दर्द उठा, तो वे टेम्पो ठीक कर अस्पताल के लिए निकले। आप सब जानते हैं कि आजकल सामान्य प्रसव में कितनी परेशानी होती है—डॉक्टर तरह-तरह की उलझनें बताकर सर्जरी कर देते हैं। भला हो इस गड्ढों वाली सड़क का कि घर से निकलकर मात्र 300 मीटर ही चले होंगे कि गड्ढों के झटकों से टेम्पो में ही सामान्य प्रसव हो गया। रामसेवक बाबू सरकार और जिले के सभी पदाधिकारियों को शत-शत नमन कर रहे हैं।
शास्त्री नगर में चोरी की घटनाएं भी बंद हो गई हैं, क्योंकि हर घर में बच्चे-बूढ़े सभी रात भर खांस रहे हैं। चोर बेचारा भी परेशान है। एक तो सरकार रोजगार नहीं दे रही, और जो आत्मनिर्भर बनकर चोरी करने निकले थे, उनका रोजगार भी इन धूल भरे गड्ढों से फैली खांसी ने बंद करा दिया है।
सड़क किनारे लगने वाली चाय की दुकानों में दूध गरम करते ही धूल के कारण उसका रंग गहरा भूरा हो जाता है, जिससे चाय का खर्च भी बच जाता है।
मंदीप बाबू के पिता जी घर से निकलते ही एक गड्ढे में गिर गए। डॉक्टर ने तीन दिन का अल्टीमेटम दिया है और उधर सड़क बनाने वाले ठेकेदार ने भी तीन दिन का ही अल्टीमेटम दिया है।
मेरे सरकार, एक ही तो दिल है—कितनी बार नोचोगे?
खुद तो बंद गाड़ियों में चलते हो, और जो कर्मचारी हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए रखे गए हैं, वे भी वातानुकूलित वाहनों में चलते हैं। उन्हें क्या फर्क पड़ेगा? फर्क इस लोकतंत्र में सिर्फ मालिक रूपी जनता को पड़ता है।
ईश्वर आप सभी को अश्वत्थामा जैसा अमर कर दे, ताकि अनंत काल तक ऐसा ही “विकास” करते रहें।
अंत में—
"मुझे फूंकने से पहले मेरा दिल निकाल लेना,
ये किसी की अमानत है, कहीं साथ जल न जाए।"
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