नारी के सिर पर ईंटों का बोझ: विकसित भारत या अपमानित भारत?

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ब्लॉग प्रेषक: डॉ. अभिषेक कुमार
पद/पेशा: साहित्यकार व विचारक
प्रेषण दिनांक: 26-04-2026
उम्र: 36
पता: ठेकमा, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर: 9472351693

नारी के सिर पर ईंटों का बोझ: विकसित भारत या अपमानित भारत?

© आलेख: डॉ. अभिषेक कुमार 

     वाह क्या विजन है नारियों के सर पर आठ ईंटों का भारी-भरकम बोझ तले हम विकसित भारत बनाने की योजना मन में संजोए बैठे हैं..! कितना सुंदर @2047 विकसित भारत का सपना है। महात्मा गांधी जी के नाम वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) का नाम बदल कर विकसित भारत-जी राम जी का प्रचार-प्रसार हेतु पोस्टर बनाने वाले भाई साहब जरा राम के चरित्र से ही सीख ले लते कि राम ने गौतम ऋषि की पत्नी जो अन्याय, शोषण से दबी थी उस अहल्या को पत्थर से मुक्त कर उन्हें सम्मानजनक जीवन प्रदान किए थे। उन्होंने शबरी के झूठे बेर खाकर सामाजिक कुरीतियों को तोड़ते हुए नारी के प्रति आदर प्रकट किया था।

     यदि नहीं जानते हो तो जान लो आप राजा राम का नारियों के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत सम्मानजनक और पूजनीय था, जो "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" (जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं) के आदर्श को चरितार्थ किए हैं। उन्होंने अपनी पत्नी, माता, और अन्य स्त्रियों को सदा यथोचित स्थान, आदर और सुरक्षा प्रदान की, जिससे वे नारी सशक्तिकरण के शाश्वत प्रतीक बने। आज उस देश में कहीं फरमान आता है महिलाएं रानी मिस्त्री का कार्य करेगी। बस के कंडक्टर बनेगी, भारी वाहन जैसे बस ट्रक चलाएगी। सदियों से जो पुरुष श्रम मजदूरी अब तक करते चले आ रहे थे वह अब महिलाओं को करने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है उस देश में जहां नारियों को सदा से सम्मान सर्वोपरि रहा है। नारियों को इस देश में साक्षात देवी, दुर्गा शक्ति का स्वरूप माना जाता रहा है। बड़े से बड़े क्रूर राजा महाराजाओं को भी नारियों के प्रति आदर सत्कार की भावना सुनने को मिलता है। आज भी कोई अत्याचारी पुरुष नारियों पर हाथ उठाने, अत्याचार करने से पहले दस बार सोचता है।

      अनादि काल से महिलाएं सृजनकर्ता रही है चाहे वह धरती माता हो या जन्मदात्री माता वह सदैव कुछ न कुछ देती रहती है। नारियां पालन पोषण, घर परिवार के कुशल संचालन के उपरांत आर्थिक, सामाजिक गतिविधियों में भी पुरुषों को पछाड़ी है पर इसका यह मतलब नहीं कि विकसित भारत महिलाओं के सर पर ईंट पत्थर, सीमेंट चुना, गारा मिट्टी के भार लाद कर होगा..? इसके बिना भी हो सकता है..! आज रोबोटिक आर्टिफिशियल इंटलीजेंस AI का युग है। बहुत सारे देशों में मानव जैसा कृत्रिम निर्मित रोबोट/मशीन ईंट पत्थर सीमेंट आदि ढो रहे हैं हम रोबोटिक यंत्रों के निर्माण में क्यों नहीं महिलाओं को शिक्षा-दीक्षा, रोजगार में प्रत्यक्ष भूमिका दे सकते..? रोबोटिक यंत्रों की कारखाना बनाने पर क्यों नहीं बल लगा रहे..? हम जात पात धर्म, संप्रदाय अगड़ा, पिछड़ा, ऊंच नीच की राजनीति में कब तक उलझे रहेंगे..? यह आम सवाल है जो प्रत्येक जनमानस को आत्मचिंतन करना चाहिए। आज दैनिक उपयोग की सैकड़ों वस्तुओं का इक्का-दुक्का, नामी-गिरामी किन्हीं स्थानों पर स्थापित कारखाना दिन-प्रतिदिन अमीर पर अमीर होते चले जा रहे हैं.. हमारी सरकार क्यों नहीं प्रत्येक जिला, ब्लॉक में उपभोग की प्रत्येक वस्तुओं का कारखाना स्थापित कर 125 दिन के बदले 365 दिन का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रोजगार की गारंटी दे सकती..? जाकर आप देखिए जहां कल कारखाने स्थापित है वहां संबंधित तरह-तरह के  रोजगार का भरमार रहता है। 

      बेशक नारियों में पुरुषों के अपेक्षा अच्छाई ज्यादा है। महिलाओं के पास धूम्र पान, मदिरा पान बीड़ी सिगरेट अय्याशी का नशा नहीं है जो पुरुषों में विद्यमान है। महिलाओं के सर पर ईंट पत्थर का भार न देकर शासन सत्ता कि बागडोर सौंप दिया जाए तो मैं समझता हूँ बंदरबाट हो रहे देश की सार्वजनिक परिसंपत्तियां बच जाएगी। नारियों की प्रधानता और उनके हाथ में पूर्ण रूप से शासन सत्ता कि बागडोर होने से यह देश असल में सुरक्षित हाथों में होगा और वास्तव में विश्व गुरु बन पाएगा। अन्यथा जुमला सुनते-सुनते, झूठी दिखावा के वहम में हम सभी की बुढ़ापा आ जाएगी और अंत में पता चलेगा कि देश इतना खोखला हो गया कि अब इसका कोई समाधान नहीं दैविक शक्ति के उत्थान के अलावा..! 

    अतः हे मानव नारियों को सम्मान दो, उन्हें खूब पढ़ाओ लिखाओ, आगे बढ़ाओ और ऐसे रोजगार की गारंटी दो जो उनके प्रकृति और प्रवृति के अनुरूप हो.. पुरुषों के कार्य महिलाएं करने लगे और महिलाओं के कार्य पुरुष करने लगेंगे तो समाज का सुक्ष्म संतुलन बिगड़ जाएगा। महिलाओं को सर पर ईंट पत्थर नहीं ढूलवाओ, यह कार्य पहले पुरुष ही करते थे वही करें। यदि पुरुष इस कार्य करने लायक नहीं बचे तो इस प्रकार के कार्य हेतु रोबोट बनाओ। महिलाओं को रानी मिस्त्री बनाकर ईंट पत्थर न जुड़वाओ, बस ट्रक न चलवाओ यह सब पुरुषों का कार्य है, इसमें पुरुष वर्ग ही शोभा देते हैं इनको ही करने दो। यदि पुरुष नहीं मिल रहे तो आजकल सेल्फ ऑटोमेटिक ड्राइविंग भी होती है वह तकनीक अपने देश में विकसित करो। महिलाओं को बेशक रोजगार दो पर वह उनके मान-सम्मान के लायक हो। आजकल देखता हूँ कहीं कहीं शादी ब्याह में कम उम्र की लड़कियां मेहमानों को खाना परोसती है। होटल रेस्टोरेंट में महिलाएं खाना परोसती नजर आ जाती है। एयर होस्टेस महिलाएं ही क्यों होती पुरुष यह कार्य क्यों नहीं कर सकते..? क्या राम और कृष्ण के अवतार भूमि भारत में अब यही सब देखने को बाकी रह गया है। नारियां न काम करने की मशीन है न भोग विलास, आनंद की वस्तु.. वह सतयुग, त्रेता, द्वापर में आदरणीय पूज्यनीय रही है और इस कलयुग में भी वंदनीय है। प्रत्येक नारी का पुत्र, पति, भाई बंधु होते हैं। इनकी भी नैतिक जिम्मेदारी है कि घर गृहस्थी चलाने हेतु पैसे की लालच में बहन, पत्नी, माता जैसे सम्माननीय नारियों से वह कार्य न कराओ जो उनके मर्यादा के अनुरूप ठीक नहीं लगता। असहाय, निराश्रित महिलाओं के लिए सरकार को विशेष योजना चलाना चाहिए जहां उन्हें उनकी गरिमा के अनुरूप अच्छा काम मिल सके।

      नोट: यह हमारे निजी विचार है। इससे कोई सहमत हो या नहीं हो यह मायने नहीं रखता। हमारा मकसद किसी की निजीगत स्वैच्छिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। यह आलेख संविधान से मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और  विचारों से है।

डॉ. अभिषेक कुमार

साहित्यकार व विचारक 

मुख्य प्रबंध निदेशक 

दिव्य प्रेरक कहानियाँ मानवता अनुसंधान केंद्र 


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