रखैल कहो या लिव इन रिलेशनशिप, यह कुसंस्कार समाज के लिए घोर अभिशाप।

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ब्लॉग प्रेषक: डा. अभिषेक कुमार
पद/पेशा: साहित्यकार, प्रकृति प्रेमी व विचारक
प्रेषण दिनांक: 29-01-2024
उम्र: 34
पता: ठेकमा, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर: 9472351693

रखैल कहो या लिव इन रिलेशनशिप, यह कुसंस्कार समाज के लिए घोर अभिशाप।

©आलेख: डॉ. अभिषेक कुमार

         दुनियां में भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां भाव एवं श्रद्धा की महत्ता है। तभी तो यहां भावपूर्ण श्रद्धापूर्वक पत्थर पूजे जाते हैं। सूर्य,चांद, तारे, नदी, पहाड़, समुद्र आदि जीवन जीने के लिए अति आवश्यक अवयवो, ऊर्जा के वह अदृश्य स्रोतों को कृतार्थ मानकर अपने कल्पनाओं के अनुसार सगुण साकार प्रतिमूर्ति बना कर या निर्गुण निराकार मानकर धन्यवाद कृतज्ञता स्वरूप भावपूर्ण श्रद्धापूर्वक पूजा अर्चना की जाती है। वास्तव में इसी रहस्य को विज्ञान आकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित करता है।

श्रृष्टि प्रारंभ से ही इस भूमंडल पर नारियों की प्रधानता उनकी गरिमा सर्वोपरि रही है। अनादि काल से भारत भूमि का गौरव रहा है नारियों में पतिव्रता धर्म पालन के महत्व का। माता अनसूया को कौन नहीं जानता जिनके पतिव्रता धर्म का पालन, सतीत्व की चर्चा पूरे त्रिभुवन में प्रसारित हो गई। श्रृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी, सृष्टि के पालनहार भगवान नारायण और श्रृष्टि संघारक महाकाल महादेव शंकर जी अपने अपने धर्म पत्नियों के विशेष जीदपूर्ण आग्रह को स्वीकार कर माता अनसूया के आश्रम सतीत्व के परीक्षा लेने गए तो उनके धर्मानुकूल पतिव्रता धर्म के दिव्य प्रभाव से ब्रह्मा विष्णु महेश छः महीने के बालक हो गए तथा सृष्टि विस्तार की प्रक्रिया अवरुद्ध हो गई। माता सरवस्ती, लक्ष्मी और पार्वती द्वारा माता अनसूया से हार मान बड़ी अनुनय विनय के बाद तीनो भगवान मुक्त हो पाएं। अर्थात ईश्वर ने यह साबित किया की धर्मानुकूल वैवाहिक दांपत्य जीवन में नारी की सतीत्व, पतिव्रता धर्म पालन के आगे स्वयं ईश्वर भी छोटे हैं फिर बुरी नगहें वाले दुराचारी पापी की क्या मजाल जो किसी सती नारी को छेड़ दे..? उसके सतीत्व के प्रभाव से ऐसे पापी दुराचारी व्यक्ति का समूल नाश निश्चित है इसमें कोई किंतु परंतु है ही नहीं। माता सीता के पतिव्रता धर्म पालन के महत्व भी वर्तमान कलयुगी नारियों को प्रेणास्पद है जिन्होंने विश्व विजयी रावण जिसके स्वर्ण जड़ित लंका के सुख सुविधा का वैभव जहां देवतागण, ग्रह नक्षत्र सहित स्वयं काल उसके यहां बंदी है और रावण से मुकाबला करने के लिए उस समय त्रिभुवन में कोई सामर्थ्य नहीं रखता था जिसके विवाह प्रस्ताव को अनसुना कर खाली पैर तपस्वी वेश में वन वन भटकने वाले राम के अपने मन से तनिक क्षण के लिए भी विस्मृत नहीं होने दी, ऐसे माता सीता इसी सतीत्व के प्रभाव से ही सतीत्व पर हांथ डालने वाला दुराचारी अजय लंकाधिपति रावण अपने कुल बंधु बांधव पुत्रों के साथ समूल नाश को प्राप्त हुआ। यह अपराध वह नहीं करता तो उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता था। वहीं इस घोर कालिकाल के कलुषित वातावरण में कुछ नारियां धन संपदा वैभव पाने के चक्कर में अपने से पच्चीस तीस साल बुड्ढे उम्र के बुजुर्गो को अपना पति बड़े शान से बना ले रही है। वहीं कुछ नारियां पैसे और मस्ती के लालच में अपने पति रहते पर पुरुष से आलिंगन व्यभिचार करने में जरा सा संकोच नहीं कर रही है। कुछ नारियां धर्म पूर्ण विवाह के पूर्व  बाल्यकाल ब्रह्चर्य के अवधी के दौरान ही मौज मस्ती, गहना, कपड़ा के लिए फूलों से पराग चूस गांधहीन बेजान कर उड़ जाने वाले भंवरे समान परपुरुष के आगे अपने जिस्म ऐसे खिलौने के भांति सौंप दे रही जब तक मन नहीं भरा अगला खेल खेला जब मन भर गया उसे गला रेत कर, शरीर के कई टुकड़े टुकड़े कर गुप्त स्थानों पर फेंक दिया या ना जाने कौन कौन सा दुर्गति किया..!

भारत भूमि श्रृष्टि प्रारंभ से ही नारी प्रधान देश रहा है तभी तो लक्ष्मी नारायण, सीता राम, राधे कृष्णा, नमो पार्वती पतैये नमः आदि नामो का उच्चारण हम सभी बाल्यकाल से सुनते आएं हैं। इस देश में विवाह की भी नियम, धर्म, मर्यादा स्थापित की गई है। परिवारजनों द्वारा शास्त्र सम्मत विधि के फलस्वरूप एक बार विवाह हो जाने के पश्चात वर वधु एक दूसरे को चाहे जैसे भी सुंदर, गुणवान, धनवान, सामर्थ्यवान अथवा कुरूप, दुर्गुण, व्यसनकारी, निर्धन, लंगड़ा, लुल्हा, कोढिया चाहे जैसा भी वह है अपना अपना भाग्य समझ कर एक दूसरे को लोग सहर्ष स्वीकार करते थें। नारियां विरासत में मिले भाव और श्रद्धा के कारण अपने पति में परमेश्वर का स्वरूप देखने लगी और इसी परम तत्व के प्रति आजीवन समर्पण तथा त्याग अर्पण निर्वहन के कारण पतिव्रता, सतीत्व की उच्चतम प्रकाष्ठा पर पहुंची। परंतु बीते एक दो दशकों में इस देश के गुलशिता पर भी तीन चार शादियां वाली पाश्चात्य देशों की कुसंस्कृति का गहरा असर पड़ा। शादी तो छोड़िए इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे तीसरे दसक में बगैर धर्म अधर्म पूर्ण शादी किए लड़के लड़कियां एक दूसरे के साथ बिना डर भय के लिव इन रिलेशनशिप में व्यतीत कर रही है। जबकि भारतीय संस्कृति में बिना धर्म पूर्वक विवाह किए अमर्यादित यौन संबंध बनाने का सामाजिक स्वीकृति नहीं है। परंतु वर्तमान समय में लीक से भटके, शास्त्र वेद पुराणों को कूड़ा करकट समझने वाले बेहया किस्म के बिगड़े औलादों ने हीन भावना सामाजिक अस्वीकृत रखैल को अंग्रेजीकृत लिभ इन रिलेशनशिप को संज्ञा देते हुए अपने माता पिता पूर्वाजो और भारत भूमि के कीर्ति को धूमिल कर रहे हैं। खास बात यह है की ऐसे कुछ लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले कुछ जोड़े बड़ा मशहूर भी है जिनके फॉलोवर सोशल मीडिया पर करोड़ों है। इक्कीसवीं सदी के पहले भी रखैलो की इक्का दुक्का किस्से मिलते हैं परंतु इनका सामाजिक स्तर आज भी कोठे की वेश्याओं से भी बदतर है। वर्तमान समय में शास्त्र वेद पुराणों के प्रति लोगो की दूरी और सात्विक साहित्य पठन के प्रति उदासीनता लोगों के इस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है जो सत्य, गलत या दूरगामी परिणाम के प्रभाव का भेद करना तो छोड़ो सोचने तक के तार्किक विवेक शक्ति शेष नहीं बची है। इसी कारण रखैल, लिव इन रिलेशनशिप जैसे गंदे भीभत्सय सामाजिक कुरीतियों को लोग वर्तमान फैशन आधारित दुनियां में सबकुछ सामान्य और जायेज मान रहे हैं और इसे बढ़ावा दे रहे हैं। तभी तो प्रकृति के नियमाविरुद्ध, शास्त्र निंदित अति भयानक कुकृत्य समलैंगिक विवाहों का भी कई स्थानों पर सक्षम प्राधिकार द्वारा मान्यता और बढ़ावा मिल रहा है जो मानवता के लिए नरक समान है।

दुर्दांत षड्यंत्रकारी, शास्त्रों में विकृंडन करने वाला महा पापी दुराचारी, अत्याचारी अंग्रेज अधिकारी मैकाले के आगमन के पूर्व अठहरवीं शताब्दी के मध्य तक या इससे पहले तक भारत में एक सशक्त मजबूत गुरुकुल वैदिक शिक्षा पद्धति युक्त देशी शिक्षण व्यवस्था मौजूद थी। जहां 21 वर्ष तक युवक युवतियां पूर्णतः ब्रह्मचर्य के कठोर नियमों का पालन करते हुए धर्मानुकूल शास्त्र सम्मत दिव्य उच्च आदर्श शिक्षा ग्रहण करते थें तदुपरांत जब वे गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर वैवाहिक दांपत्य जीवन के डोर में बंधते थें तो उनके अंदर सद्गुणों का भरमार रहता था। वे अपने परिवार में उत्तम जीवन व्यतीत करते हुए एक सुंदर सुसंस्कृत, मर्यादित उन्नत समाज के ताना बाना बुनते थें तथा अपने अगले वंशो में भी मानवता, नैतिकता धर्म के ज्ञान को प्रवाह करते थें। परंतु वर्तमान में ऐसे संस्कारवान वैदिक शिक्षा पद्धति दुर्लभ हो जाने के कारण व्यक्ति न खुद को समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहा न आपने बच्चो को उच्च नैतिक शिक्षा प्रदान कर पा रहा है। जिसका प्रभाव सामने है कामवासना का व्यभिचार, गंदी हरकत रखैल, लिव इन रिलेशनशिप जैसी सामाजिक कुरीतियां, कुसंस्कार।

असल में जिनका दिमाग, बुद्धि और मन दिवालिया हो चुका है अर्थात जिनके परमात्मा स्वरूप बिंब के प्रतिबिंब आत्मा में दैहिक सौंदर्य का आकर्षण कामवासना नामक शत्रु का डेरा हो गया है जिसकी उत्प्रेरणा से बुद्धि सुमति की रह छोड़ कुमति के मार्ग पर चलते हुए मन को भ्रमित कर देता है उसे मोह जाल में जकड़ कर उसके अधीन उसके इशारों पर नाचने वाले इंद्रियां दैहिक भोग के लिए कामातुर हो जाती है जो वास्तव में एक दिन पतन का कारण बनता है। जबकि देव दुर्लभ मिले मानव तन जिसकी मूल शक्ति आत्मा राष्ट्रपति के समान सर्वे सर्वा महामहिम है। व्यक्ति का बुद्धि प्रधानमंत्री के समान मन सहित समस्त इंद्रियों को अपने बाल सामर्थ्य से जो चाहे वह सद्गति करा सकता है। वहीं मन पूरे शरीर के समस्त इंद्रियों का स्वामी सेना पति के समान नियंत्रणाधिकारी है। इन तीनों का सात्विक ताल मेल व्यक्ति को साधारण मानव से असाधारण देव तुल्य बना सकता है जिसका वर्णन इतिहास में कोई एक नहीं हजारों मौजूद है।

भारत भूमि के नारियां सदैव से आदरणीय पूज्यनीय सम्माननीय रही है जिसका मूल आधार उनका उत्तम आदर्श चरित्र, पतिव्रता धर्म ही है तभी तो स्वयं अनंत कोटि ब्रह्माण्ड के अधिनायक जगदीश्वर ने कई बार विभिन्न माताओं के गर्भ से जन्म लिया है। एक मजबूत शुद्ध मां के गर्भ से ही असाधारण ओजस्वी, तेजस्वी दैविक गुणों युक्त असाधारण महामानव, परोपकारी, किसी विशेष विधा के ज्ञाता, जगत कल्याणकारी कीर्ति वाला बालक का जन्म हो सकता है। किसी रखैल, लिव इन रिलेशनशिप वाली माताओं के गर्भ जिसका कुंवारापन अमर्यादित शास्त्र विपरीत कुआचरण से पहले ही खंडित हो चुका है वैसे अशुद्ध गर्भ से देवता क्या दानव भी जन्म लेना नहीं चाहते। ऐसे दूषित गर्भ से केवल विकृत मानसिकता के नीरस, ओजहीन, तेजहीन लंपट स्त्री, पुरुष जन्म लेते हैं।

सनातन सभ्यता संस्कृति में विवाह कितना पवित्र तरीके से कराए जाने का प्रावधान है... सर्व प्रथम वर वधु पक्ष के बड़े बुजुर्गों के राजामंदी, समस्त नाते रिश्तेदारों का जमावड़ा, वैवाहिक कार्यक्रम में कुल देवता, स्थान देवता, ग्राम्य देवता, तैंतीस कोटि देवी देवता, पांच महाभूतो अग्नि, वायु, धरती अकास, और जल देवता का पूजन व साक्षी मानकर तथा सैंकड़ों हजारों बाराती, घराती के समक्ष जीवन भर एक दूसरे का साथ निभाने के वास्ते शादी के सात फेरे लिए जाते हैं तदुपरांत दांपत्य जीवन का सच्चा तृप्तिदायक सुख भोगते हैं।। असल में यही सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण पाश्चात्य देशों के अपेक्षा दूसरे तीसरे चौथे विवाह के मामले भारत में बेहद कम है। परंतु लिव इन रिलेशनशिप जैसे बढ़ते कुसंस्कृति के वजह से दूसरे, तीसरे, चौथे विवाह के मामले में तेजी से वृद्धि हो रहा है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का बहुत बड़ा सबब है। इतनी खूबसूरत सनातनी वैवाहिक रीति रिवाज को नजरंदाज कर अमर्यादित असभ्य लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले लड़के, लड़कियां सिर्फ और सिर्फ कामवासना पूर्ति करना उनका मकसद है और कुछ नहीं। एक दूसरे से जी भर जाने के पश्चात फिर तीसरा विकल्प, फिर चौथा, पांचवा.... इसी कामवासना के पूर्ति में एक दिन जीवन का दुःखद अंत... जिसके त्वरित और ज्वलंत उदाहरण है हिंदी सीने जगत के अभिनेता बाबू सुशांत सिंह राजपूत और भोजपुरी सिनेमा के अभिनेत्री अंकांक्षा सिंह जिन्होंने फिल्म जगत में नाम और धन बेशुमार कमाया परंतु धर्म पूर्ण विवाह न कर के विवाह का सुख बिना विवाह किए अर्थात लिव इन रिलेशनशिप में रह कर उठाना चाहा परिणाम पूरे जीवन का सत्यानाश..! और माता पिता के नैनो में छोड़ गए उम्र भर के आंसू। फिल्म जगत के इस ग्लैमर्स भरी जीवन, फिल्मों में खुलेआम नग्नता, अश्लील हरकतें और बेढब गंदे बोल के गाने युवक युवतियों के कामाग्नि को और तेज लहराने में ज्वलनशील तेल का काम किया है जिसका यह परिणाम है मानव तन के सार्थक सदुपयोग करने के बजाय प्रेम मोहब्बत कामवासना पूर्ति के शिवा दुनियां में रखा ही क्या है..! जीवन में धैर्य, संयम कहा बस तत्कालीन दैहिक सौंदर्य आकर्षण पूर्ति के लिए कुल खानदान, माता पिता के मान सम्मान मिट्टी में मिला कर लिव इन रिलेशनशिप में रहना न उनके विश्वास को तोड़ना है बल्कि खुद के साथ भी धोखा है। इससे ईश्वर कतयी खुश नहीं हो सकता, क्योंकि उसके बनाए विधि के विधान के विपरीत है। परम पिता परमेश्वर के दुलारे हो जाओ न... यह पूरे ब्रह्मांड उसी का है फिर जो चाहो वही मांग लो।

शहरो में बने ऐसे पार्क जहां विधार्थी जीवन के युवक युवतियां खुलेआम प्यार का इजहार करते एक दूसरे का आलिंगन करते देखे जाते हैं जहां कोई उन्हें रोकने टोकने वाला नहीं है ऐसे कामोतेजित करने वाले अश्लील दृश्य से नए बालको के शुद्ध मन पर भी इंद्रियों के सुख भोग की ओर स्वाभाविक खींचाव होता है। यह केवल धर्म शास्त्र अध्यात्म की छड़ी से ही बावरे, मतवाले, चंचल मन को रोका जा सकता है। उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्य मंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी ने एंटी रोमियो पुलिस टीम बना कर यह सामाजिक अपराध रोकने की जरूर कोशिश की है जो प्रसंशा के योग्य है। परंतु देश के में अभी कई बड़े शहरों में हीर रांझे, लैला मजनुओं के लिए बने स्पेशल पार्क लिव इन रिलेशनशिप जैसे सामाजिक कुरीतियों को पनपाने में भरपूर सहयोग कर रहा है।

ऐसे घृणित लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली लड़के लड़कियां जहां निवास करते हैं वहां दबी जुबान से पास पड़ोस के लोग भी निंदा करते हैं, टोन कसते हैं, मजा लेते हैं तथा कुछ दोस्त मित्र, आस पास के उचक्के मनबढ़ लोगो के गंदी निगाह भी उस बहन बेटी पर बनी रहती है, वे फिराक में रहते हैं और मौका पाते ही जबरन यौन हिंसा भी कर देते हैं। वहीं धार्मिक विवाह कर अपनी धर्म पत्नी के संग चाहे जहां भी घूमों कोई पूछने वाला नहीं है। जिन बच्चों के ऊपर माता पिता परिवार जनों का आशीर्वाद रहता है वे दुःख के घड़ी में भी चैन का आनंद लेते हैं। देखिए श्री राम को अपने माता पिता के आशीर्वाद से जंगल में भी सुकून से रहें। वहीं मेघनाद अपने माता से आशीर्वाद पाकर लंका युद्ध में दो रात के लिए विजयी हो गया। यह बात अलग है की दुनियां की कोई भी शक्ति अधर्म अन्याय को अंतिम विजय नहीं दिला सकती।

अतः बहन बेटियों को धर्मानुकूल पतिव्रता आचरण को अपनाना चाहिए। इंद्रियों के वशीभूत होकर लिव इन रिलेशनशिप जैसे घोर निंदनीय कुकृत्य की ओर नहीं बढ़ना चाहिए। सृष्टि प्रारंभ से ही दुनियां में गरीब अमीर मध्यम स्तरीय एक भी पिता का इतिहास नहीं मिलता जिसकी बेटी कुंवारी रह गई हो अर्थात उसका विवाह न हुआ हो। सभी को एक दिन विवाह हो जाता है तब तक संयम नियम धैर्य को बनाए रखना चाहिए। नारियों में दैविक शक्ति का वास होता है जब तक कोई नारी अपने धर्म मर्यादा की डोर से बाहर नहीं जायेगी तब तक उसे त्रिलोक विजयी रावण जैसे भीम भयंकर राक्षस भी बाल बांका नहीं कर सकता। यदि वे बहन बेटी भूल वश अज्ञानता में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा से बाहर चली भी आ जाती है और उसके पास धर्म नियम मर्यादा है तो रावण जैसा शक्तिशाली शत्रु को भी सोने की लंका कुल समेत मटियामेट होना पड़ेगा यह ईश्वरीय विधि का विधान है। वर्तमान में ही देख लीजिए कई बलात्कारियों को फांसी की सजा हुई उसे कोई शक्ति रोक नहीं पाया। इस लिए महिला पुरुष खुद के परिवार के लिए, समाज के लिए, राष्ट्र और प्राणी मात्र विश्व के लिए क्या कुछ अच्छा मंगल कर सकते हैं इस बिंदु पर नियमित चिंतन होना चाहिए न कि दैहिक सुख कामवासना पूर्ति का बहाना किसी के रखैल बनाना लिव इन रिलेशनशिप... इसमें नाश, सत्यानाश ही है।

राधे राधे जय जय सिया राम बोलना पड़ेगा।
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
सबका मंगल, सबका भला...

भारत साहित्य रत्न व राष्ट्र लेखक उपाधि से अलंकृत
डॉ. अभिषेक कुमार
साहित्यकार, समुदाय सेवी, प्रकृति प्रेमी व विचारक
मुख्य प्रबंध निदेशक
दिव्य प्रेरक कहानियाँ मानवता अनुसंधान केंद्र
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